शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

श्री रेणुका महिमा एलबम सहयोग सूची

धामनगांव की माँ रेणुका देवी की महिमा पर तैयार ऐतिहासिक पौराणिक आडियो व वीडियो भजन एलबम निर्माण कार्य हेतु अब तक इन सभी धर्म प्रेमी भाईयो द्वारा स्वेच्छाणुसार सहयोग दिया गया

*)अर्पिता तनु मिश्रा - जबलपुर ( फ्री गायन )
*) रवि सोनी - जबलपुर (फ्री गायन )

*)शोभना कश्यप - भोपाल ( फ्री गायन)
*) गोविन्द सिंग बेनाम - जबलपुर  (फ्री गायन )
*)प्रज्ञा साहु - गुरूग्राम ( फ्री गायन )
*) वर्षा पंडोले -बैतूल - ( फ्री गायन )
*)नूपुर मौर्य - बैतूल ( फ्री गायन )
*)पाठक छायांकन - बैतूल ( फ्री वीडियो शूट )
*)रवि धोटे - धामनगांव (फ्री वीडियो शूट )
 
*) काजल फोटॊ स्टूडियो - भैसदेही - (फ्री कैमरा )
*)शैलेन्द्र यादव - आठनेर - ( फ्री वीडियो शूट )
* )रविन्द्र मानकर - सावंगी - ( all song वीडियो एडीटिंग)
*)कैलाश तारानी - देवास -( वीडियो एडिटिंग )
 
*) साक्षी शर्मा - देवास ( अभिनय सहयोग )
*)निलेश दोडकें - धामनगांव ( विशेष सहयोग )
1)मनोहर वाडेकर अमरावती घाट -5001/-
2)शोभना कश्यप - भोपाल - 3000 /-
3 ) महेश्वर दोडके - धामनगांव -2100/-
4)  टी .आर अमरगडे -धामनगांव -1511/-
5)भोजराज साकरे - धामनगांव- 2151/-
 6) ज्ञानेश धोटे - धामनगांव-1151/-
7) राजेश दोडके - धामनगांव-1111/-
8) नितिन धोटे - धामनगांव -1101/-
9) गगन बघेल - अमरावती घाट -1101/-
10) संदीप साकरे - धामनगांव -1101/-
11) हरिराम अमरघडे - धामनगांव -1101/-
 12) ज्ञानदेव पांसे - धॉमनगॉव-1101/-
 13) मानिकराव अमरघडे - धामनगांव-1101/-
 14) संजय उइके - धामनगांव -1101/-
 15) अजय अमरघडे - धामनगाँव - 1100
16) पांडुरंग अमरघडे - धॉमनगॉव-1100/-
17) विनोद पटेल - धामनगांव-1100/-
 18) पंकज कटारे - धॉमनगॉव-1001/-
 19) प्रतीक लहरपुरे - धॉमनगॉव-1001/-
20)  हेमंत सातपुते - भिलाई-1001/-
21) युवराज  कापसे - हिवरा -1001/-
22) शिवम  तराडे - धॉमनगॉव- 1001/-
23) रितेश दोडके - धॉमनगॉव-551/-
24) बंटी बारस्कर - बैतूल -551/-
25) विट्ठल बारमाशे - धामनगांव-551/-
26) कमलेश अमरघडे -धामनगांव-511/-
27) केशव राव दोडके - धामनगांव -511/-
28) राधेश्याम यादव - खामला -501/-
29) संदीप धॉधोडे - सुरगांव -501/-
30) गौरव पारधे -भरकावाडी-501/-
31)तुषार अमरघडे - धामनगांव -501/-
32) योगेश बनकर - बैतूल - 501/-
33) अजय धोटे - सातनेर-501/-
34) योगेश साहू - धामनगांव -501/-
35) अनिल बारमाशे - धामनगांव-501/-
36) पंकज राठौर - भैसदेही -501/-
37) देवीदास लोखण्डे - घोघामा - 501/-
38) गणेश अमरघडे - धामनगांव -501/-
39) प्रवीण दवण्डे - एनखेड़ा -501/-
40) रिंकेश टेकपुरे - हिडली-501/-
41) राजेश साकरे - धामनगांव-501/-
42) विनोद अमरघडे - धॉमनगांव -501/-
43) सत्यवान अमरघडे - धामनगांव-501/-
44) यशवंत गिरी महाराज - धामनगांव -500/-
45) दिनेश वागद्रे - धामनगांव -500/-
46) कमलेश धोटे - धामनगांव-500/-
47) सचिन बारस्कर - गुदगांव -500/-
48)अज़ाब लिखितकर -  सावंगी-500/-
49) शंकर चरपे - धामनगांव-500/-
50) भरत लहरपुरे -धामनगाँव - 225/-
51) व्यंकटराव दोडके- धामनगाँव - 200/-
52)  पारस लहरपुरे -धामनगाँव 200/-
53) दौलतराव अमरघडे - धामनगाँव - 151/-
54) लवलेश आजाद-धामनगाँव - 151/-
55) हेमराज पांसे-धामनगाँव - 151/-
56) नारायण साहू - इदौर-110/-
57) उमराव सोनारे - जामगॉव-105/-
58) राजेश बसंतपुरे - धामनगाँव -101/-
59) विनोद कटारे - धामनगाँव - 101/-
60) रमेश गीद- धामनगाँव - 101/-
61) गुलाबराव धोटे - धामनगाँव - 101/-
62) गंगाराम देशमुख- धामनगाँव - 101/-
63) नितिन बारमाशे- धामनगाँव 101/-
64) रामु दोडके- धामनगाँव-100/
65) मदन धोटे-धामनगाँव- 100/-
66) जितेन्द-धामनगाँव -100/-
67) तुलसीराम मोहकर -धामनगांव 100/-
68) साहेबलाल गढेकर- सचिव - 80/-
69) विकास लाडे -धामनगाँव - 51/-
70) प्रवीण धाडसे-धामनगाँव - 51/-
71) भोलाराम साहू-धामनगाँव - 51/-
72) केशऱ धोटे-धामनगाँव -51/-
73) कैलाश बुवाडे-धामनगाँव - 51/-
74) गावंडे जी-धामनगाँव - 51/-
75) बी.पी तिवारी-धामनगाँव -51/-
76) सुरेन्द्र सुर्यवंशी-धामनगाँव - 51/-
77) सुरेश खातरकर-धामनगाँव -51/-
78) अमरघडे फर्निचर-धामनगाँव -51/-
79) अरविन्द मालवीय-धामनगाँव -51/-
80) सीताराम चिल्हाटे-धामनगाँव -51/-
81) सचिन भोजे-धामनगाँव -51/-
82) अजय धोटे-धामनगाँव -51/-
83) बाबुलाल आजाद-धामनगाँव -51/-
84) कपिल कटारे-धामनगांव - 51/-
85) सुदामा राजगुरू-धामनगांव -51/-
86) रामदास गीद-धामनगांव - 51/-
87) बलदेव पांसे-धामनगांव - 51/-
88) रूपम बसंतपुरे-धामनगांव - 51/-
89) शंकर बसंतपुरे-धामनगांव - 51/-
90) मॉ गायत्री जनरल स्टोर - धामनगांव - 51/-
91) रामचन्द्र साहू -धामनगांव - 51/-
92) कुवर पालीवाल - धामनगांव - 51/-
93) तरूण साहू - धामनगांव - 51/-
94) विनोद कनाठे - धामनगांव - 51/-
95) दिगम्बर धोटे - धामनगांव -50/-
96) सोनू साहू -धामनगांव - 50/-
97) प्रदीप जाट-धामनगांव - 21/-
98) प्रभुजी चिल्हाटे - धामनगांव -21/-
99) रामचन्द्र चिल्हाटे- धामनगांव -21/-
100) वागद्रे किराणा -धामनगाँव  - 21/-
101) रमेश चिल्हाटे- धामनगाँव -  21/-
102) निलेश साकरे- धामनगाँव  21/-
103) रेणुका रूप सृंगार-धामनगाँव - 21/-
104) जगदीश बसंतपुरे-  धामनगाँव -21/-
105) शेषराव धोटे- धामनगाँव - 20/-
106) माणिकराव देशमुख - धामनगाँव - 20/-
107) जगदीश अलोने- धामनगाँव -11/-
108) भुपेन्द्र अमरघडे- धामनगाँव - 11/-
109) शुभम धोटे - धामनगाँव -11/-
110) योगेश सराटकर-धामनगाँव- 11/-
111) सुजल सराटकर-धामनगाँव -11/-
112) रामहरि साहू- धामनगाँव -10
113) विकास ईवने - गेहूँ बारसा - 251/-
114) राजू मर्सकोले -बैतूल - 251/-
115 - मस्तराम कुशवाह - खंडवा - 100
116) मनोज सोलंकी - बैतूल - 251
116) अलकेस मस्की - सेलगाँव - 251
117) उमेश गावंडे - गायखाम
118) रवि शर्मा - नागदा -101/-
119) निलेश धोटे - धामनगाँव - 1151
120) नामदेव धोटे धामनगाँव - 1000
121)  गणपति बारस्कर - बिसनुर -501
123) किशोर साहू - हरियाणा - 4000/-
124) हेमंत देशमुख - कोर्टखेडी - 1000/-
125) अशोक कापसे - हिवरा -1000/-
धर्म प्रचार - प्रसार मंच इन सभी सहयोगी भक्तो आत्मीय रूप से आभार व्यक्त करता हैं । कुछ ऐसे भी भक्त हैं जिनका माँ रेणुका कें पुनीत कार्य मे वक्त दान किया हैं धर्म प्रचार प्रसार मन्च उन सभी भाईयो का बहुत बहुत धन्यवाद व्यक्त करता हैं । जिन दो लॊगॊ ने माँ रेणुका महिमा मे दिया अपना सहयोग मांगा था उन्हे सम्मान कें साथ वापस दे दिया हैं । किसी भक्त का नाम सहयोग सूची से छूट गया हो तो अवश्य बताए । अगर आप हमारे ब्लॉग मे आपके नाम कें आगे आपकी फोटॊ लगाना चाहते हो हमे व्हा्ट्सअप (9806284177) पर फोटॊ भेजे । माँ रेणुका का कोई भी कार्य हो बिना परीक्षा का होता ही नहि इसलिए भूलवश कोई गलती उदेश्य से भटककर किसी हुई हो तो माँ से एक क्षमा प्रार्थना अवश्य करे ।

राष्ट्रीय धर्म प्रचार प्रसार मंच भारत ( एशिया )
राष्ट्रीय धर्म प्रचारक - रविन्द्र मानकर 

शनिवार, 20 जुलाई 2019

धर्म प्रचार - प्रसार मंच के गीत रचनाएं

First Album Bhajan List

 दोहा
आल्हा ऊदल दोऊ गये रे , मां शारद के द्वार
और अकबर ज्वाला गये , पा गये मुक्ति द्वार
ध्यानु गये मां वैष्णवी रे , पाए भक्ती अपार
जो ध्यावे श्री अम्बे मां , तर जाये भव पार

(1)
श्री गणेश का सुमिरन करके, मां अम्बे का ध्यान लगाय ।
मात सरस्वति तुम्हे मनाऊं , मेरे कंठ विराजो आय ।
भुल चुक जो भी हो जाये ,  करना माता क्षमा प्रदान ।
मां अंजनी के राज दुलारे , पहरे पर बैठे हनुमान ।
मंगला देवी तुम्हे मनाऊ , रखना माता मेरी शान ।
हे देवन के देव महादेव , रखना लाज मेरी भगवान ।
कथा सुनाउ मां अम्बे की , सुनियो श्रोता चतुर सुजान ।
लिखवे नाम बनावे आल्हा , महिमा चांदनी रही बखान ।
(2)
मातेश्वरी अम्बा माई की , गाथा सुनलो ध्यान लगाय ।
सतपुडा पर्वत पर है बिराजी , धारुड वालीमात कहाय।
शिव के ससुर थे दक्ष प्रजापति ,यज्ञ दिये थे शुरु करवाय ।
नही निमंत्रण शिव को भेजे ,ये अपमान सहा न जाय ।
सती कुद पडी हवन कुण्ड मे , यज्ञ दियो विध्वंस कराय ।
सती शव लेके शिवजी धुमे , सतपुडा पर्वत पर है आय ।
अंग सती के गिरे धरनी पे , तब से धारुड धाम कहाय ।
जै जै कार हो अम्बे मां की ,भगत सभी है ध्यान लगाय ।
(3)
म.प्र बैतुल जिले मे , बैठी माता आसन मार ।
सारे जगत मे तेरी मैया ,होय भवानी जै जैकार ।
गुफा के अन्दर बैठी हो अम्बे ,करके मां सोलह सिंगार ।
मंगला मां की बनी समाधि ,जिनको पुजे सब नर नार ।
भक्त कहे मां राधा जिनको ,मां शक्ति का है अवतार ।
जिनके गुरु श्री सुरदास थे ,उनसे शिक्षा मिलि अपार ।
शिवधाम मे बैठके गुरुवर ,भक्ति का करते संचार ।
धारुड आठनेर मे गुंजे ,मां राधे की जै जैकार ।
(4)
भक्ति की शक्ती बडी मैया , करती राधे मां हरसाय
जंगल बियाबान मे धुमे , कैसी लिनी लगन लगाय ।
प्यास लगी इक दिन मैया को , पानी कही नजर ना आय ।
बिन पानी के मां राधे का , चेहरा रहा देख मुरझाय ।
एक गुफा दिखलाई उनको , राधे मां गई है हरसाय ।
मन ही मन मे सोच रही है , यहाँ पानी पीने मिल जाय ।
पहुची गुफा के अन्दर मंगला , देख अचम्बा गई चकराय।
बैठी गुफा मे अम्बे रानी, जिसकी महिमा कही ना जाय ।
(5)
मां अम्बे के दर्शन करके , मन अन्तर की बुझ गई प्यास।
 ऐसी मोहित भई मैया पे, पानी बिन जो रही हतास।
इसी गुफा मे करती ,भुल गई है दिन और रात ।
ऐसी लगन लगी मैया से , मैया चारो तरफ दिखात।
1970 की भक्तो तुम्हे सुनाती हुँ मै बात ।
 कृपा करी जगदम्बा मैया , जिनकी महिमा कही न जात ।
राधे मां की भक्ती देखकर , मां की शक्ति गई समाय ।
तेज बडा मस्तक पे इतना , जिसकी प्रसंशा की ना जाय ।
(6)
कई वर्षौ तक करी तपस्या ,अपने मन मे धीरज धार
अन्न का दाना छोड़ दिया है,फल पत्तो का किया आहार ।
राधे मां को दर्शन देने , आ गई अम्बे सिंह सवार ।
दर्शन करके जगदम्बा के , मंगला बोली जै जैकार ।
कहन लगी जगदम्बा मैया , बेटी सुन ले वजन हमार ।
तेज जन्म हुआ है मंगला , जन-जन का करने उध्दार ।
जो भी इस दरबार मे आये , उसकी सुनना करुण पुकार ।
दुखियो के दु:ख दर्द मिटाना ,भक्तो के भरना भण्डार
(7)
गाय चराने को आते थे , दुर दुर से यहाँ पे ग्वाल ।
इक दिन प्यास लगी ग्वाले को , पानी की करे तलाश ।
इसी गुफा मे पहुच गया है ,जल की मन मे लेकर आस ।
राधे मां को देख के ग्वाला ,करने लगा है अरदास ।
कहाँ से आई हो तुम मैया,किसकी बैठी ध्यान लगाय ।
सारा हाल सुना राधा मां , उस ग्वाले से कहा समाझाय।
सारी गाथा सुनकर ग्वाला ,अपने गाँव गया है आय।
गांव-गांव मे पीट डिंढोरा ,घर घर सबको रहा बताय।
(8)
सावंगी और हिवरा गांव के , जुडने लागे भक्त तमाम।
केशो भाई चले है देखो , राधे मां का लेते नाम ।
गोंडी घोघरा के नरनारी बोलत , चल दिये जै जैकार ।
पावन गुफा के पाये दर्शन , माता का कीन्हा दीदार ।
मां मंगला के संग भक्तो ने गुप्त गुफा मे किया प्रवेश ।
मां अम्बे के करके दर्शन , कट गये सबके कठिन कलेश।
देख के भक्ति मां राधे की , दिन दुना फैला परचार ।
म.प्र.बैतुल जिले में , होवे मां की जै जैकार ।
(9)
राधे मां ने करने यात्रा ,अपने मन मे ली है ठान ।
चली है तीरथ करने मैया ,हाथ धर्म का लिये निशान।
एक सरोवर मिला मैया को ,बैठे जहाँ शंकर भगवान ।
श्री गणेश और पार्वती की ,प्रतिमा सुन्दर मिली महान ।
कुछ ही दुर मे काली मां का ,सुन्दर मिला एक स्थान ।
फल फुलो का लगा बगीचा ,जिसकी कही न जाये ना शान।
उस बगीचे मे बैठे साधू , माता का कर रहे थे ध्यान ।
मंगला को उन साधु ने ,अभय दे दिया वरदान ।
(10)
ऐसी पावन गुफा की भक्तो ,गाथा तुमको दई सुनाय ।
मंगला माता बडी तपस्वी ,राधा माता बोली जाय।
इस मन्दिर मे अमावस पुणो ,होती भक्तो भीड़ अपार।
दुर दुर से नर और नारी आकर करते है दीदार ।
जिसकी जो भी मनोकामना ,यहां पर आ पुरी हो जाय ।
उसकी भर जाती है झोली ,जिसने ली है लगन लगाय।
रहत  कडोंदा और कटंगा , माता दई बेनाम बनाय।
राधा मां का नाम सुमरके ,चांदनी सबको दई सुनाय।
जय अम्बादेवी

Second Album Bhajan List

आओ सुनाऊँ तुमको महिमा मां ताप्ती के नाम की  ।
महिमा गजब निराली है इनके पावन धाम की ।
जय ताप्ती मैया...जय ताप्ती मैया...

प्रिय भक्तो पुण्य सलिला ताप्ती माँ जो युगों युगों और  कल्पो -कल्पो से सूर्यदेव के बाहों मॆ अखिलिया करते हुये ऊँचे नीचे रास्तों से गुजरते हुये कही फूल खिलाती है..कही अन्न उगाती जन जन जीवन का संचार करती हुईं मूलतापी के गौ मुख से निकलकर पूरे देश का भ्रमण करती हुईं सूर्यपूर के अरबसागर मॆ विलीन हो जाती है । ताप्ती मैया की महिमा कितनी निराली है , भक्तो ये पापों को धोकर मुक्ति दिलाती है , मृत्यु सीमा पर पड़े मनुष्य के मुँह यदि
ताप्तीजल की दो बूँद डाल दी जाये या भूलवश भी ताप्ती जल मॆ मृत देह की अस्थि प्रवाहित हो जाती है तो उस मृत  आत्मा को मुक्ति मिल जाती है ।
ताप्ती मैया सृष्टि आरम्भ से निरन्तर बहती चली आ रही है ।
ये कभी थकती है ना कभी विश्राम करती है , हम सब की झोली सुखों से भरती रहती है । ताप्ती कहाँ से आयी  , कैसे आयी और कहाँ जाती है ,इस पतित पावनी ताप्ती मैया की कथा आपको सुनाती हूँ..।

1. सूर्य देव का हुआ विवाह  ये बात है बड़ी पूरानी  ।
विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा बनी सूर्य की रानी ।
सूर्यदेव संज्ञा के संग जीवन लगे बिताने ।
यम मनु और यमुना उनकी तीन  हुई  संताने ।
संज्ञा सूर्य के तेज को सह ना सकी ज्यादा ।
सूर्यदेव को छोड़ने का उसने किया इरादा ।
सूर्यदेव की सेवा में छोडा अपनी  छाया को।
संज्ञा घोड़ी बनकर तप  करने गई मन्दिर को ।
ना उसको डर था ना थी फिकर हर  अंजाम की ।
आओ सुनाओ....

इधर सूर्यदेव भी अपने तेज से संसार को गति दे रहे थे, उनके प्रचण्ड तेज से पृथ्वी पर तापमान और गर्मी इतनी बढ़ गई कि धरती सूर्य के तेज से नष्ट हो रही है ,पृथ्वी के हिम झिलाखण्ड भी पिघलकर पीछे हट रहे थे । अत्यधिक गर्मी से पृथ्वी कि प्राण वायु पर असर पडने लगा जिसके कारण सभी जीव ब्रम्हा जी मॆ समाने लगे । सूर्य देव के तेज के कारण ब्रम्हा भी सॄष्टि कि पुन : निर्माण करने मॆ असफल रहे । तब सभी देव और माँ पृथ्वी शिव शंकर महादेव के पास जाकर प्रार्थना करने लगे । तब महादेव जी ने सभी से कहाँ..

2. छोड़ दो चिंता सारी अब तुम हो जाओ तैयार ।
सूर्यदेव की पुत्री ताप्ती अब लेंगी अवतार ।
ताप्ती मैया इस धरती का बढ़ता ताप हरेँगी ।
वो सबका कल्याण करेंगी सबके पाप हरेंगी ।
आंखों में उम्मीद लिए मन में लेकर आस ।
इतना सुन कर चले गए सब सूर्य देव के पास ।
सब देवो ने सूर्य देव के आगे सर को झुकाया ।
अब आपको रक्षा करना है सबके प्राणों की ।
आओ तुम्हे सुनाऊँ...

धरती पर बढ़ती गर्मी और तापमान को रोकने के लिये सभी देवों ने सूर्यदेव से प्रार्थना कि और धरती माँ ने कहाँ हे प्रभु अगर आपने सॄष्टि रक्षा के लिये ताप्ती माँ ध्यान नही किया तो सारी सॄष्टि का विनाश हो जायेंगा ।सबकी प्रार्थना सुनकर सूर्यदेव ने अपनी पुत्री का ताप्ती ध्यान किया -

3. सूर्य देव ने अपनी पुत्री को याद किया था  जिस दिन ।
वो आषाढ़ का महीना सप्तमी का था दिन ।
सूर्य देव के ताप से प्रकट हुई मां ताप्ती शक्तिशाली ।
उनके तेज से चारों दिशाएं हो गई उजियाली ।
प्रथम नदी के रूप में ताप्ती धरती पे  आई । ताप हरा मां ने धरती का खुशियां लौटाई ।
सूर्य ने अपने तेज से इनको प्रकट किया।
तब से ताप्ती मैया इनका नाम हुआ। लाज रख ली मैया ने सबके सम्मान की ।
आओ सुनाओ...

तब से हि ताप्ती माँ को आदिगंगा भी कहते है क्युकी वो हि सॄष्टि आरम्भ मॆ जल के रुप मॆ धरती पर आयी है । सभी नदियों उनका सेवन करती है , परन्तु उधर जब भगीरथ जी कि कठिन तपस्या से गंगा धरती पर नही आयी तब विष्णु जी ने पूछा कि हे देवी आप ब्रम्हा जी के कमन्डल से धरती पर क्यू नही जा रही हो , तो गंगा जी ने कहाँ

4. मां ताप्ती की महिमा इतनी सब उनको पुजेँगे ।
मैं जाऊंगी धरती पर मुझको नहीं पुजेँगे ।
विष्णु जी बोले नारद से तुम धरती पर जाओ ।
ताप्ती जी के पुराने सारे ग्रंथ चुरा ले आओ ।
ताप्ती ग्रंथ ना होने से उन्हें दुनिया नहीं जानेगी ।
धरती पर फिर सारी दुनिया गंगा तुम्हे नहीं मानेंगे ।
ताप्ती मां से झूठ बोलकर नारद ने ग्रंथ चुराए ।
गंगाजी तब आई धरा पर दुनिया महिमा गाए ।
तब से ही कम है धरती पर महिमा तापी नाम की ।
आओ सुनाओ तुमको...

तापी पुराण चोरी होने से माँ ताप्ती का प्रभाव तो कम नही हूआ पर लोग ताप्ती जी कि महिमा ज्यादा जान न पाये । ताप्ती माँ को नारद जी द्वारा धोके का पता चला तो उन्होने को कुष्ठ रोग का श्राप दिया और गंगा जी को अपने हि कुलवंश मॆ वधू बनकर आने का और उनकी वंश बेल ना बढ़ पाने का श्राप दिया ।श्राप से भटकने के बाद नारद मुनि ने मूलतापी आकर ताप्ती माँ कि 12 साल तपस्या की जब ताप्ती माँ प्रसन्न हुईं और उनके जल मॆ स्नान करके नारद जी श्राप मुक्त हुये । उधर गंगा मैया को भी शान्तनु से विवाह करके ताप्ती माँ की पौत्रवधू बनना स्वीकार करना पड़ा । आषाढ़ सप्तमी पर गंगा जी ताप्ती माँ के जल सेवन करती है । समुद्र मंथन से निकली मदिरा जो राक्षसों ने वरुण देव को दे दी थी और वरुण देव ने उस मदिरा का पान अगस्त मुनि के आसन पर किया जिसे देखकर अगस्त मुनि ने वरुण देव को मनुष्य योनि मॆ जन्म लेने का श्राप और पुत्र मुख देख मुक्ति का उपाय बताया । इन्ही का ताप्ती जी के साथ विवाह हूआ ।

5. वन में जब संवरण करने आये शिकार। वन में वो अपना दिल गये तब हार ।
जब तकराई ताप्ती से संवरण की नजर ।
मोहित हो गए ताप्ती को पल में देखकर ।
राजा ने फिर ताप्ती से अपनी कही कहानी ।
फिर बोले करके विवाह बन जाओ मेरी रानी ।
ताप्ती बोली मुझ को पाना है तो ऐसा करो ।
मै सूर्य पुत्री मेरे पिता को प्रसन्न करो । अदृश्य हुई ताप्ती करके बोल काम के। आओ सुनाओ सुनाओ..

इधर संवरण ताप्ती जी को पुकारते हुये बेहोश हो गये फिर जब वो होश मॆ आये तो उन्होने ने सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिये उनका तप शुरू किया । इधर सूर्यदेव ने संवरण के तप की परीक्षा ली ।एक बार रात को संवरण ध्यान मॆ मग्न थे. तब उनके कान मॆ आवाज लगाई कि हे राजन तू यहाँ किसका तप कर रहा है, उधर तेरी राजधानी आग से जल रही है , तेरा कुटुम्ब जल रहा है , तेरे नाम कि बदनामी हो रही है । परन्तु फ़िर राजा का तप नही टूटा ।संवरण कि दृढ़ता देख सूर्य नारायण प्रसन्न हुये और प्रकट होकर संवरण को वर माँगने को कहाँ फिर -

6. संवरण ने सूर्य देव को देखकर किया नमन ।
मांग रहे सूर्यदेव से वो अनमोल वचन ।
हे भगवन अपनी पुत्री को दे दो ये  आजादी ।
सात फेरे लेकर ताप्ती कर ले मुझसे  शादी ।
सूर्य देव बोले संवरण बात पता है सारी । गुरु वशिष्ठ के हाथों कराओ शादी की तैयारी ।
सबकी राजी मरजी से फिर पूरण काज हुये ।
संवरण और ताप्ती एक दूजे के हुए । फिर अपनी जिंदगानी एक दूजे के के नाम की ।
आओ सुनाओ

इसके बाद सभी देवों और ब्रम्हाणो ने संवरण और ताप्ती को आशीर्वाद दिया । शादी के कूछ अंतराल बाद ताप्ती जी ने एकपुत्र को जन्म दिया और अपने पुत्र का मुँह देखकर संवरण श्राप मुक्त हुये और अपने वरुण देव स्थान को प्राप्त हुये । ताप्ती जी ने अपने पुत्र का नाम कुरु रखा और राज बाग डोर अपने पुत्र के हवाले सौंप वो भी अपने स्थान चली गई । फिर जिस जगह ताप्ती जी के पुत्र गुरु ने तप किया था आगे चलकर वह कुरु
क्षेत्र धर्मक्षेत्र प्रसिद्ध हुआ । राजा कुरु पांडवों और कौरवों के पितामह बने । राजा जनमेजय के सर्प विनाशी यज्ञ से धर्म हानि हुईं जिसका निवारण भी ताप्ती जी चरणों पर हुआ माँ ताप्ती सर्पों के निवेदन पर उन पर विराजमान हो गई ।


ताप्ती माँ  के धाम के......4
इक्कीस कल्प के इक्कीस तीरथ सब की खास बात
इक्कीस तीरथ क्यों है जरूरी सुनो सुनाओ बात.....
दीवानों आओ मेरे साथ
भक्तो आओ मेरे साथ
1.  सूर्यलोक पहला तीरथ ताप्ती माँ जन्मी थी ।
पहली नदी के रूप में धरती पर आई थी ।
मुलतापी तीर्थ दूजा सुन लो मेरे भाई ।
ताप्ती माँ यहीं धरा पर जल के रूप में आई ।

इसी मुलतापी तीर्थ में साथ कुंड है ....
( सूर्य..शनि..ताप्ती..धर्म कुंड..पाप..नारद .नागा )

हर एक कुंड की है यहां रही है अपनी खास बात ।
दीवानों आओ मेरे साथ......
2.   शांडिल्य मुनि ने ताप्ती तट पर जप-तप खूब किया ।
इसलिए ये तीसरा तीरथ शांडिल्य तीर्थ हुआ ।
चौथा तीर्थ श्रवण तीरथ बनकर हुआ साकार ।
माता पिता संग आए थे यहां श्रवण कुमार ।
सुन लो सारे तीरथ के क्या-क्या करामात
दीवानों आओ मेरे साथ.....

3. पारसढोह तीर्थ पाँचवा  ऐसी यहां की शक्ति ।
कपिला छट गऊ दान से मिलती यहाँ मुक्ति ।
सूर्यमुखी तीरथ पर ताप्ती उलटी दिशा में बहती ।
इस तीरथ पर श्राप से मिल जाती है मुक्ति ।
कर लो बस स्नान जब आए मकर संक्रांत।
दीवानों आओ मेरे साथ....

4.सातवा तीरथ पावन है बारहलिंग शिव धाम ।
अपने पिता की श्राप मुक्ति यहां करें श्री राम ।
कान्हा ने जब देह त्यागी  क्रोधित हुए दुर्वासा ।
यहीं से स्वर्ग सिधारे जब खत्म हुई हर आशा ।
देवलोक के स्वर्ग का एक ही रस्ता देवल घाट ।
दीवानों आओ मेरे साथ

5.ब्रम्हा के आदेश पे मोहनी भंग करे एक तप ।
पूछ रही वो शिव शंकर से क्या करूं मैं अब ।
बोले भगवन ताप्ती माँ के जल में तुम समाओ ।
मोहिनी ताप्ती संगम बनकर यहां से मुक्ति पाओ।
छ :महीने यहां स्नान करें जो सिद्ध हो हर काज ।
दीवानों आओ मेरे साथ...

6. दसवा तीर्थ स्थालेेश्वर इसीलिये  कहे ।
गय्या बनके यहाँ पे यमुना ताप्ती प्रवेश करे ॥
इच्छापूरी तीरथ पे इच्छा पूरी होती सारी ।
तप करे  एक ब्राह्मण हो प्रसन्न माँ अवतारी ।
देवी ने ब्राह्मण के मन की पूरी कर दी बात ।
दीवानों आओ मेरे साथ........

7. ताप्ती पूर्णा संगम देखो बारवा तीरथ कहांए ।
यहां श्री विष्णु आदिवराह रूप में थे आए ।
सारंगखेडा तीरथ यहां इंद्र देवता आये ।
यहां से एक सुरंग से होकर वो पाताल जाएं
कर लो यहां स्नान रहता सात जनम तक  राज
दीवानों आओ मेरे साथ....

8.  चक्रतीर्थ में कृष्ण जी ने करंक दैत्य को मारा ।
इस तीरथ से होकर दैत्य स्वर्ग को सिधारा ।
प्रकाशा तीरथ पापनाशक जल इसका मतवाला ।
जो भी  करे स्नान  उसके जीवन में हो उजाला।
ब्रह्माजी यहां स्नान करें गजब इसकी बात
दीवाना आओ मेरे साथ..........

9. श्री गणेश कार्तिकेय को बाला तीरथ समझाए
ताप्ती शरण में आए कार्तिक मात- पिता को पाएँ
गौतम ऋषि की विनती से  ताप्ती मां यहाँ आई ।
रहने लगी फिर मां यही पे तीर्थ है फलदाई ।
ऐसा है तीरथ गोतमेश्वर यहां  नवाऊं माथ ।
दीवाना आओ  मेरे साथ.....

10. भैरवी तीर्थ पर इंद्र पुत्र ने श्राप से मुक्ति पाएं ।
भैरवी देवी की स्तुति उसने यहां जब गाई ।
सूर्य देव का तेज हुआ कम  होने लगे बेचैन ।
ताप्ती समुद्र संगम तीर्थ से मिला उन्हें चैन ।
ताप्ती जी के जल में नहाकर मिटा इंद्र संताप
दीवाना आओ मेरे साथ...
11. कुरुक्षेत्र मॆ  हुआ ताप्ती मां का स्वयंवर।
ताप्ती मां ने पुत्र कुरु को दिया यहां कीर्तिवर ।
ताप्ती झिरी में मां ताप्ती करती सदा ही वास ।
याद करे जो यहां पर मां को हो जाता है एहसास।
योगी संत को मछली रूप में दर्शन दिया साक्षात ।

दीवाना आओ मेरे साथ...
भक्तो आओ मेरे साथ...
इक्कीस कल्प के इक्कीस तीरथ सबकी खास बात
इक्कीस तीरथ क्यों है ज़रूरी सुनो सुनाऊँ बात



https://youtu.be/T9WvF5LOi9Q
नगरकोट महारानी रेणुका
आये शरण तुम्हारी माँ
        ...... रेणुका मैया हो

1) धामनगाँव बना अलबेला
   रोज लगे भक्तगण का मेला
   परशुराम महतारी रेणुका
    आ गये शरण तुम्हारी माँ

रेणुका मैया तोरे अंगना रे
तोरे अंगना रे भवन के भंडार रे
 रेणुका मैया हो
 नगरकोट महारानी रेणुका
आ गये शरण तुम्हारी माँ

2) अम्बादेवी धारूड वाली
   आष्टा नगर की मैया काली
  होवे जय जयकार भवानी
आ गये शरण तुम्हारी माँ

मोरी अम्बा मईया तोरे लाने रे
तोरे लाने रे लाये चुनरी भवानी गोटेदार
मोरी अम्बा मैया हो
आ गये शरण तुम्हारी माँ

3)  जल प्रवाह बनकर लहराई
   सूर्यपुत्री ताप्ती महारानी
  वेग लिये अति भारी भवानी
  आ गये शरण तुम्हारी माँ
  मोरी ताप्ती मैया बनके जल की धारा
 बनके जल की धारा मुलताई से निकली
 मोरी ताप्ती मैया हो

4) ग्राम चिचोलि की चण्डी माई
  दुवारे लाल ध्वजा लहराई
  करते जय जय कार भवानी
  आ गये शरण तुम्हारी

मोरी चन्द्रपुत्री  पूर्णा नदी माँ
पूर्णा नदी माता भैसदेही मे बनो दरबार रे
मोरी चन्द्रपुत्री माँ

  5) बारहलिंग दिखे ना दूजा
    यहाँ राम जी कर गये पूजा
    संग मे जानकी दुलारी भवानी
    आये शरण तुम्हारी माँ
    मोरे भोले बाबा तोरी महिमा से
   तेरी महिमा से परदेसी ना जाने बेनाम रे
   मोरे भोले बाबा रे

रुणुक झुणूक माँ विंध्यवासिनी, आगई मेहँदी गावं
भक्तों को तारन बैठीं माँ,नीम की थंडी छाव - 2

विन्ध्याचल की विंध्यवासिनी, मेहँदी गावं की शान हो
भक्तों को दर्शन देकर माँ, करती जग कल्याण हो
पर्वतराज का मान बढ़ाकर - 2 आई मेहँदी गावं
भक्तों को तारण बैठी माँ, नीम की थंडी छाव - 2

हुआ अवतार योग मात का, विंध्य गिरी मे छाई
पूजित हुई संसार में माता, अष्‍टभुजा कहलाई
एक दिवाने भक्त की खातिर - 2 पहुची मेहँदी गावं
भक्तों को तारण बैठी माँ, नीम की थंडी छाव-2

पावन हो गई गाव की धरती, जबसे चरण पडे माँ
दुर्गा दुर्गती दूर करो माँ, दुर्गा दास कहे माँ
कर स्विकार माँ आरती - 2 और दे आचल की छाव
भक्तों को तारण बैठीं माँ, नीम की थंडी छाव-2

रुणुक झुणूक माँ विंध्यवासिनी, आगई मेहँदी गावं
भक्तों को तारन बैठीं माँ,नीम की थंडी छाव - 2

माँ ताप्ती अवतरण की कथा

       माँ ताप्ती जन्म की कथा

प्रिय भक्तो पुण्य सलिला ताप्ती माँ जो युगों युगों और  कल्पो - कल्पो से सूर्यदेव के बाहों मॆ अखिलिया करते हुये ऊँचे नीचे रास्तों से गुजरते हुये कही फूल खिलाती है..कही अन्न उगाती जन जन जीवन का संचार करती हुईं मूलतापी के गौ मुख से निकलकर पूरे देश का भ्रमण करती हुईं सूर्यपूर के अरबसागर मॆ विलीन हो जाती है । ताप्ती मैया की महिमा कितनी निराली है , भक्तो ये पापों को धोकर मुक्ति दिलाती है , मृत्यु सीमा पर पड़े मनुष्य के मुँह यदि ताप्तीजल की दो बूँद डाल दी जाये या भूलवश भी ताप्ती  के जल मॆ मृत देह की अस्थि प्रवाहित हो जाती है तो उस मृत  आत्मा को मुक्ति मिल जाती है । ताप्ती मैया सृष्टि आरम्भ से निरन्तर बहती चली आ रही है ।
ये कभी थकती है ना कभी विश्राम करती है , हम सब की झोली सुखों से भरती रहती है । ताप्ती माता  कहाँ से आयी  , कैसे आयी , कैसे माँ ताप्ती जी का अवतरण हुआ और ताप्ती  कहाँ जाती है ,इस पतित पावनी ताप्ती मैया की कथा आपको सुनाता हूँ..
आदिकाल में भगवान शिव ने कैलाश पर्वत पर देवताओ की सभा में कार्तिकेय महाराज को ताप्ती माहात्म्य सुनाया था । उस सभा में उपस्थित रोमेश मुनि ने यह ताप्ती महात्म्य गोकर्ण मुनि से कहाँ था । रोमेश मुनि से गोकर्ण ऋषि ने ताप्ती महात्म्य सुनकर कहाँ यह बहूत उत्तम हैं ।
गोकर्ण मुनि ने द्वापर युग के अंत में रोमेश मुनि से सुना ताप्ती महात्म्य सुनकर पृथ्वी लोग के मुनियों को सुनाया । मुनियों के माध्यम से ताप्ती महात्म्य सम्पूर्ण विश्व में फैलता गया । पौराणिक हिन्दु ग्रंथो व शास्त्रों में प्रमुख स्कंदपुराण , भविष्यपुराण , सूर्यपुराण, वाराह पुराण , ब्रम्हपुराण , महाभारत , शिवपुराण, नर्मदापुराण में वर्णित ताप्ती महात्म्य को मैंने ( रविन्द्र मानकर ) संकलन किया जो आपको सुनाने का प्रयास कर रहे हैं , आशा हैं आपको यह अनमोल ताप्ती महात्म्य बहूत पसंद आएगा ।

एक बार शिव पार्वती पुत्र कार्तिकेय जी अपने हठ के कारण कैलाश छोड़कर दक्षिण चले गए । तब उन्हे माता - पिता की  अवहेलना करके अपने हठ से बड़ी ग्लानि हुई । श्री कार्तिकेय जी ने अपने अनुज गणेश जी को अपना दुख बताया , तब श्री गणेश जी ने उन्हे सम्पूर्ण तापो का निवारण करने वाली भगवती ताप्ती की शरण में जाने और वहां बेल वृक्ष के मूल में शिवार्चन  का विधान बताया ।
कार्तिकेय जी ने छः महीने वह अनुष्ठान किया और ताप्ती कृपा से उनकी ग्लानि मिट गई । परिणामस्वप शिव जी के चरणो में अनुराग उत्पन्न हुआ जिससे वे आनन्द पूर्वक कैलाश लौट आये । कैलाश के रमणीय शिखर पर भगवान शिव सुखपूर्वक शान्त मुद्रा में बैठे थे । कुमार कार्तिकेय ने कमल और पारिजात पुष्प तथा से उनकी पूजा की फिर उनके चरणो के समीप भूमि पर आसान बिछाकर बैठ गए । तब भगवान शिव ने उन्हे विकार , चिता और ग्लानि रहित देखा तो कुशल प्रश्नो के बाद उनको हृदय से लगाकर आशीष पूर्वक उनका परितोष किया ।  कार्तिकेय जी के कैलाश आते ही सभी देवी देवताओ और ऋषि मुनि भी कैलाश पर आशीर्वाद देने पहुंचे ।
तब भगवान शिव पुत्र कार्तिकेय जी के मन में सूर्यपुत्री ताप्ती जी की महिमा जानने की ईच्छा व्यक्त हुई ।   तब वे पिता शिव शंकर जी के पास गये और बोले पिताजी क्या सूर्यपुत्री ताप्ती जी का माहात्म्य नही हैं ? क्या श्री तप्तीजी नदियों मॆ प्राचीन नही हैं ?
तब शिवजी बोले - पुत्र सूर्यपुत्री ताप्ती जी कि बड़ी महिमा है, पुराने समय मॆ , जो श्री नारद जी ने कहाँ था । वह मेरे द्वारा ही कहाँ हुआ हैं । मैंने ही उन्हे बताया था कि जब गंगा ,नर्मदा ,गोमती आदि नदियाँ नही थी तब से सूर्यपुत्री ताप्ती प्रकट हुई हैं । आगे भगवान शिव कहने लगे पुत्र श्री गंगाजी में कई दिनो तक स्नान करने , नर्मदा जी के जल के दर्शन करने से और सरस्वती जी के संगम का जल पीने से जो पवित्रता होती हैं ,वही पवित्रता श्री ताप्ती के स्मरण मात्र से मनुष्य को होती हैं । यह ताप्ती आति प्राचीन हैं ।
  इतना सुनकर कार्तिकेय जी पूछा  - हे तात मैंने ताप्ती जी के दोनो किनारो आपके सुन्दर अर्चित लिंगो का दर्शन किया है प्रिय अनुज गणेश ने भी मां तापी महत्ता का गुणगान किया है , तात आप तापी जल क्यो धारण करते हो मुझे बताईये ।

तब भगवान शिव बोले- हे पुत्र  कार्तिकेय जिस तरह भगवान सुर्यदेव अपनी इच्छा से गति करते है एवं सदैव
कर्मशील रहते है । उन्हे इस ब्रम्हाण्ड की आत्मा कहा जाता है उनके बिना सृष्ठी चारो अन्धकार ही
रहेंगा । उसी तरह पृथ्वी लोग पर मां तापी के बिना जीव-जीवन सम्भव नही था । मां ताप्ती
तीनो लोको के तापो का निवारण करती है ,वो ही सृष्टी की आदिगंगा है । मां तापी मोक्ष्यदायिनी है ,जिव और
जिवन का आधार है जो भी उनके शरण मे जाता
उसके सभी तापो  को हर लेती है तापी जी ।
तब भगवान शिव आगे कहने लगे पुत्र मै तुम्हे ताप्ती माहात्म्य  सुनाता हुँ जिसके ध्यान मात्र से मनुष्य भवपार हो जाता हैं । भगवान शिव बोले -  हे पुत्र कार्तिकेय जब सूर्य नारायण का विवाह भगवान विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से हुआ । विवाह के कुछ समय पश्चात उन्हें तीन संतानो के रूप में मनु, यम और यमुना की प्राप्ति हुई इस प्रकार कुछ समय तो संज्ञा ने सूर्य के साथ निर्वाह किया परंतु संज्ञा सूर्य के तेज को अधिक समय तक सहन नहीं कर पाईं उनके लिए सूर्य का तेज सहन कर पाना मुश्किल होता जा रहा था ।
 इसी वजह से संज्ञा ने अपने पति की परिचर्चा अपनी छाया को पति सूर्य की सेवा में छोड़ कर ,वह एक घोडी का रुप धारण कर मन्दिर में तपस्या करने चली चली गईं। अपनी इच्छा से संसार को गति देने वाले हिरण्यगर्भ भगवान सुर्य भी अपने तेज से संसार को गति दे रहे थे उनके प्रचण्ड तेज के कारण सृष्टी पर महाप्रलय आया था । पृथ्वी पर गर्मी और तापमान इतना अत्यधिक बढ़ गया था ,जिससे जमीन उर्वरा शक्ति पुरी तरह खत्म हो गई थी । पृथ्वी के हिम झिलाखण्ड पिघलकरपीछे हट रहे थे ।
अत्यधिक गर्मी से सबसे अधिक पृथ्वी पर छाई प्राण वायु पर्तो पर पढ़ रहा था , जिससे सृष्टी के सभी जीव ब्रह्राजी मे विलिन होने लगे । ब्रम्ह्राजी ने पुन : सृष्टी रचना करने की कोशिश की लेकिन सुर्यदेव के प्रचण्ड तेज से वे भी व्याकुल हो गये ।
अत : ब्रम्ह्राजी ने भगवान शिव और विष्णू जी का ध्यान किया । तब भगवान शिव ने पृथ्वी मां और देवताओ से कहा कि आप चिंता ना कीजिये इस बार भगवान हिरण्य गर्भ सुर्यदेव  की पुत्री ताप्ती जन्म लेंगी जो सारे जगत के ताप हार कर जन जन का कल्याण करेंगी ।
स प्रकार शिव जी के कहने पर सभी देवता गण एवं पृथ्वी मां भगवान सुर्यदेव के पास गये और उनसे प्रार्थना की इस महाप्रलय से सृष्टी को विनाश होने से बचाये ।अत:
भगवान सुर्यदेव ने अपनी पुत्री ताप्ती का ध्यान किया ।
सुर्यपुत्री ताप्ती ताप्ती उनके ताप से उत्पन्न होकर सारी दिशाओ एवं आकाश को अलौकिक करते हुए अपने पिता का सन्ताप दूर करते भूलोक पर प्रकट हुई । इस प्रकार सृष्टी निर्माण के समय प्रथम नदी के रुप में ताप्ती जी का अवतरण हुआ। मां ताप्ती जी का जन्म आषाढ़ शुक्ल
सप्तमी को दोपहर में हुआ। सुर्यदेव ने अपने तेज
से ताप उत्पन्न करके ताप्ती जी को अवतरित किया था ,इसलिए सुर्यपुत्री का नाम तप्ती हुआ । महाभारत ,भविष्यपुराण,स्कन्धपुराण आदि अनेक पुराणो मे माँ तापी जी का उल्लेख मिलता है । 

ताप्ती संकलनकर्ता  : रविन्द्र मानकर 

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

माँ ताप्ती झिरी की कहानी

मां सुर्यपुत्री ताप्ती ने अलग-अलग स्थानो पर प्रकट होकर अपने भक्तो का ताप निवारने व उन्हे जल संकट से बचाया है ।
ऐसी ही
 ~  एक सत्य घटना पर आधारित  है मां ताप्ती की गाथा ~ 
जहाँ मां तापी अपने भक्तो के कल्याण के लिये सदा सदा के लिये बस गई ।
प्राचिन काल मे आठनेर नगर के समीप एक योगि सन्त रहते थे ।
वे प्रतिदिन ही तापी जल से स्नान करने के पश्चात मां ताप्ती जी आराधना कर देवी-देवताओ का पुंजन कर तप करने लग जाते थे ।
योगि सन्त की कुटिया से तापी नदी की दुरी लगभग 12 कि.मी थी , जिसे चलकर प्रतिदिन योगि सन्त तापी मे स्नान एवं जल लेने के लिए जाते थे । धीरे धीरे समय बितता गया और योगि सन्त कि उम्र भी काफी बढ़ चूकी थी ।
प्रात : तापी तट पर जाकर स्नान करना करना और अपने कमण्डल मे पुष्पो का जलाभिषेक देवी देवताओ के पुजन के लिए अपने कुटिया पर लेकर आना और तपस्या में लीन रहना ।
एक वक्त योगि सन्त के जीवन में ऐसा आ गया किई उन्हे चलने के लिए लाठी का सहारा लेना पढ़ा ,पर उन्होने तापी मैया के दर पर जाना नही बन्द किया ।
यही भगवान के लिये भक्त की परीक्षा होती है । उनकी इस पीड़ा को देखकर मां ताप्ती जी को उन पर दया आ गई ।
एक दिन जब योगी सन्त जैसे स्नान कर मां तापी को प्रणाम करने लगे तो मां तापी ने उन्हे प्रत्यक्ष दर्शन दिये और कहा की बेटा मैं आपकी भक्ती से प्रसन्न हुं ।
अब आपके सब संकट दुर हो जायेंगे और आपको इतनी दुर मेर तट पर स्नान एवं जल लेने के लिए नही आना पडेंगा । बेटा अब तुमसे ठीक से चलना भी नही होता फिर तुम प्रतिदिन मेरे तट पर आते रहे ।
मां ताप्ती जी ने कहा की तुम अपनी कुटिया के पास अपने तप करने वाले स्थान पर एक झिरा खोदो मै  वही आ जाऊंगी ।
मैं तुम्हे मछली रुप मे दर्शन दुंगी एवं नाक मे नथनी पहनी रहुंगी । तब मां तापी के निर्देश पर योगी बाबा ने अपने तप करने वाले स्थान पर एक झिरा खोदा जिसमे भरपुर मात्रा में जलधारा निकली और योगी सन्त को मछली रुप मे नाथ मे नथ पहने मां तापी के दर्शन हुए ओर उन्होने मां तापी को प्रणाम किया ।
योगी सन्त के मन में सन्देह हो गया इसलिए वे अगले दिन पुन : लकडी के सहारे मा तापी तट पर जा पहुचे  और स्नान कर मां को प्रणाम करने लगे कि मां ताप्ती जी प्रकट हो गई और योगि सन्त से कहने लगी कि बेटा अब क्यो इतनी दुरी पर आये हो , मैं तो स्वयं तुम्हारे द्वारा खोदे झिरे में आ चुकी हुं ।तब योगि सन्त ने कहा कि मां मै कैसे मान लू की आप वहां आ गई ।सदा के लिये वहाॅ निवास करोंगी ।
मां तापीरानी ने कहा की बेटा चिन्ता ना करो तुम्हारा ये सन्देह भी मिट जायेंगा ।
बेटा ऐसा  करो ये तूम्हारा कमण्डल और यही छोडें जाओ ।
करोडो पापो का नाश कर मोक्ष्यप्रदान करने वाली ताप्ती ने कहा मै आज से सदा सदा के लिए उस झिरी में निवास करुंगी और जो मेरे जल का पान एवं स्नान करेंगा उसको सभी तापो से मुक्ति मिल जायेंगी ।
योगि सन्त अपनी कुटिया मे वापस लौट आये और अपने तप मे लीन हो गयें ।
अगले दिन जब योगी सन्त ने देखा तो पाया कि कमण्डल एवं पुष्प जो उन्होने तापीतट पर छोड़ा था , वो उनके द्वारा खोदी झिरी के पास रखा हुआ । तब योगी सन्त को तापी जी महता का ज्ञान और उस दिन से योगि सन्त ने इस झिरी की ताप्ती झिरी नाम दिया ।
योनि सन्त अब प्रतिदिन उस झिरी के जल से स्नान कर पुष्पो का स्नान कर देवी-देवी देवताओ का पुजन करते थे ।
धीरे धीरे नगर वासियो को इस बात का पता चला तो यहां प्रतिदिन अनेक भक्तगण आने जाने लगे ।
कुछ अन्तराल के बाद योगी तपस्वी महात्मा का स्वर्गवास    हो गया ।
धीरे धीरे इस ताप्ती झिरी के प्रति लोगो की आस्था एवं विश्वास की डोर बढ़ती गई ।
आठनेर नगर की मां सुर्यपुत्री की की बेटी प्रेमा मुलिक ने सन् 1999 मे ताप्ती जी की मुर्ती की प्राण प्रतिष्ठा की गई ।
वही सन् 2001 मे मां ताप्ती जी  के भक्त भगवन्तराव जी कनाठे जी द्वारा पहली बार चतुर्मास समापन और आशाढ़ शुक्ल सप्तमी पर मां सूर्यपूत्री ताप्ती जन्मोत्सव का आयोजन किया ।
वर्ष 2005 में शहर में ऐसा जलसंकट आया जिससे सारे नगरवासी दुविधा मे पड़ गये ।
किसानो की फसले सुख रही थी ।
शहर के आसपास सभी गांवो मे माह के प्रत्येक सोमवार कामकाज बन्द रख मां तापीतट वर जाना उनका भजन किर्तन चल रहा था ।
वही शहर मे मां तापी से विनती कर नलकुप खुदाई का कार्य चल रहा था ।
मां तापी के भक्त भगवन्तराव कनाठे द्वारा तापी पुराण का पाठ अपने घर पर किया जा रहा था ।
ताप्ती झिरी मे दिन रात मां तापी से विनती कि जा रही इस जल संकट से बचाने के लिये।
आखिर मां ताप्ती जी ने भक्तो की पुकार सुन ही ली ।
अचानक बादल मण्डराये और सारा नगर पानी से जलमान हो गया ।
इससे लोगो की आस्था बढ़ती चली गई ।
नगर कुछ लोगो द्वारा यहां एक समिति गठित कि गई जो इस स्थान पर ताप्ती जन्मोत्सव का आयोजन एवं तापी झिरी की देखरेख एवं संरक्षण का कार्य करती है ।

लेखक - रविन्द्र मानकर 

माँ अम्बादेवी गुप्त गुफा यात्रा 2015

माँ अम्बा देवी गुप्त गुफा दर्शन यात्रा 2015




















बुधवार, 29 मई 2019

माँ ताप्ती रानी सम्पूर्ण कथा

पार्ट 01
 एक बार की बात हैं भगवान शिव पुत्र कार्तिकेय जी के मन में सूर्यपुत्री ताप्ती जी की महिमा जानने की ईच्छा व्यक्त हुई ।   तब वे पिता शिव शंकर जी के पास गये और बोले पिताजी क्या सूर्यपुत्री ताप्ती जी का महात्म नही हैं ? क्या श्री तप्तीजी नदियों मॆ प्राचीन नही हैं ?
तब शिवजी बोले - पुत्र सूर्यपुत्री ताप्ती जी कि बड़ी महिमा है, पुराने समय मॆ जो श्री नारद जी ने कहाँ था । वह मेरे द्वारा ही कहाँ हुआ हैं । मैंने ही उन्हे बताया था कि जब गंगा ,नर्मदा ,गोमती आदि नदियाँ नही थी तब से सूर्यपुत्री ताप्ती प्रकट हुई हैं । आगे भगवान शिव कहने लगे पुत्र श्री गंगाजी मॆ कई दिनो तक स्नान करने , नर्मदा जी के जल के दर्शन करने से और सरस्वती जी के संगम का जल पीने से जो पवित्रता होती हैं ,वही पवित्रता श्री ताप्ती के स्मरण मात्र से मनुष्य को होती हैं । यह ताप्ती आति प्राचीन हैं ।
  इतना सुनकर कार्तिकेय जी पूछा  - हे तात मैंने ताप्ती जी के दोनो किनारो आपके सुन्दर अर्चित लिंगो का
दर्शन किया है प्रिय अनुज गणेश ने भी मां
तापी महत्ता का गुणगान किया है ,तात आप
तापी जल क्यो धारण करते हो मुझे बताईये ।
तब भगवान शिव बोले- हे पुत्र  कार्तिकेय जिस तरह भगवान सुर्यदेव अपनी इच्छा से गति करते है एवं सदैव
कर्मशील रहते है । उन्हे इस ब्रम्हाण्ड की आत्मा कहा जाता है उनके बिना सृष्ठी चारो अन्धकार ही
रहेंगा । उसी तरह पृथ्वी लोग पर मां तापी के बिना जीव-जीवन सम्भव नही था । मां ताप्ती
तीनो लोको के तापो का निवारण करती है ,वो ही सृष्टी की आदिगंगा है । मां तापी मोक्ष्यदायिनी है ,जिव और
जिवन का आधार है जो भी उनके शरण मे जाता
उसके सभी तापो  को हर लेती है तापी जी ।
तब भगवान शिव आगे कहने लगे पुत्र मै तुम्हे ताप्ती महात्मा सुनाता हुँ जिसके ध्यान मात्र से मनुष्य भवपार हो जाता हैं । भगवान शिव बोले -  हे पुत्र कार्तिकेय जब सूर्य नारायण का विवाह भगवान विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से हुआ । विवाह के कुछ समय पश्चात उन्हें तीन संतानो के रूप में मनु, यम और यमुना की प्राप्ति हुई इस प्रकार कुछ समय तो संज्ञा ने सूर्य के साथ निर्वाह किया परंतु संज्ञा सूर्य के तेज को अधिक समय तक सहन नहीं कर पाईं उनके लिए सूर्य का तेज सहन कर पाना मुश्किल होता जा रहा था । इसी वजह से संज्ञा ने अपने पति की परिचर्चा
अपनी दासी छाया को पति सूर्य की सेवा में छोड़ कर ,वह एक घोडी का रुप धारण कर मन्दिर में तपस्या करने चली चली गईं। अपनी इच्छा से संसार को गति देने वाले हिरण्यगर्भ भगवान सुर्य भी अपने तेज से  संसार को गति दे रहे थे उनके प्रचण्ड तेज के कारण सृष्टी पर महाप्रलय आया था । पृथ्वी पर गर्मी और तापमान इतना अत्यधिक बढ़ गया था ,जिससे जमीन उर्वरा शक्ति पुरी तरह
खत्म हो गई थी । पृथ्वी के हिम झिलाखण्ड पिघलकर
पीछे हट रहे थे ।अत्यधिक गर्मी से सबसे अधिक पृथ्वी
पर छाई प्राण वायु पर्तो पर पढ़ रहा था , जिससे सृष्टी के सभी जीव ब्रह्राजी मे विलिन होने लगे । ब्रम्ह्राजी ने पुन : सृष्टी रचना करने की कोशिश की लेकिन सुर्यदेव के
प्रचण्ड तेज से वे भी व्याकुल हो गये ।
अत : ब्रम्ह्राजी ने भगवान शिव और विष्णू
जी का ध्यान किया ।तब भगवान विष्णु ने पृथ्वी मां और
देवताओ से कहा कि आप चिंता ना कीजिये इस बार भगवान हिरण्य गर्भ सुर्यदेव  की पुत्री ताप्ती जन्म
लेंगी जो सारे जगत के ताप हार कर जन कल्याण
करेंगी । इस प्रकार विष्णु के कहने पर सभी देवता गण एवं पृथ्वी मां भगवान सुर्यदेव के पास गये और उनसे प्रार्थना की इस महाप्रलय से सृष्टी को विनाश होने से बचाये ।अत:
भगवान सुर्यदेव ने अपनी पुत्री ताप्ती का ध्यान किया ।
सुर्यपुत्री ताप्ती ताप्ती उनके ताप से उत्पन्न होकर सारी दिशाओ एवं आकाश को अलौकिक करते हुए अपने पिता का सन्ताप दूर करते भूलोक पर प्रकट हुई ।इस प्रकार सृष्टी निर्माण के समय प्रथम नदी के रुप में ताप्ती जी का अवतरण हुआ। मां ताप्ती जी का जन्म आषाढ़ शुक्ल
सप्तमी को दोपहर में हुआ।सुर्यदेव ने अपने तेज
से ताप उत्पन्न करके ताप्ती जी को अवतरित किया था ,इसलिए सुर्यपुत्री का नाम तप्ती हुआ ।महाभारत ,भविष्यपुराण,स्कन्धपुराण
आदि अनेक पुराणो मे माँ तापी जी का
उल्लेख मिलता है ।
है । 

पार्ट 02
शिवजी बोले -पुत्र  ताप्ती जी आदिगंगा हैं  वो सृष्टि आरम्भ से इस धरा पर हैं ,सभी नदियाँ ताप्ती जी का सेवन करती हैं । कार्तिकेय बोले - सभी नदियाँ कैसे ताप्ती जी सेवन करती हैं , मुझे नदियों की इस कथा बताइये ।
भगवान  शिव भोले - पूर्वकाल मॆ गंगाजी मेरे पास  कैलाश आयी और मुझसे से बोली हे नाथ ! नारद वगैरह मुनियों को ताप्ती महात्म मिला था ,उसका प्रभाव है या नही ।
तब पुत्र मैने बताया था की  - पूर्वकाल  मॆ नारद मुनि ने बड़े कष्ट से ताप्ती महात्म प्राप्त किया था। तीनो लोको मॆ उसका प्रभाव कहने मॆ कौन समर्थ हैं ।
तब मैने ने कहाँ हे देवी गंगा आप तो ब्रम्हलोक मॆ ब्रम्हा जी के कमणडल मॆ रहती हो तुम्हे बड़ी तथा महापापनाशक  श्री ताप्ती जी के बारे मॆ कैसे पता चला ।
गंगाजी बोली हे नाथ मै ब्रम्हलोक निवास  करती हूँ और मैने ब्रम्हाजी के मुख से जो सुना और आश्चर्च देखा वह ध्यान से सुनिये..अत्यंत हर्ष के साथ हम सभी बड़ी नदियाँ ब्रम्हलोक गई थी ।
वहाँ ब्रम्हाजी ने हमारे सामने उपदेश दिया था कि जो पुरुष ताप्ती जी किनारे मृत्यु प्राप्त होगा और जो पुरुष ताप्ती के जल से पुष्ट होगा और ब्रम्हाजी ने कहाँ कि ताप्ती किनारे रहने वाले पुरुष यदि महापापी दुराचारी और निर्दयी हो तो भी स्वभाविक रीति से सतगति को प्राप्त होंगे ।
ऐसा ब्रम्हाजी के मुख से उपदेश सुनकर यमराज जी को बहूत दुख :हुआ हुआ और उन्होने विचार किया कि अब मै क्या करूँ !
किस प्रकार मै सभी नदियों को बुलाकर  श्री ताप्ती से प्रार्थना कर सकूंगा कि हे देवी जो श्रद्धा विहीन पापी पुरुष भी यदि सेवन करे आपके जल का तो उसे शास्वत स्थान मत देना । यमराज ने प्रार्थना कि तब  ताप्ती नर्मदा आदि नदियाँ दिव्य अलंकार वाले विमान मॆ बैठकर जगत को उजवल करने वाली नदियाँ यमपूरी मॆ आयी॥
इसके बाद मॆ विनय पूर्वक  धर्मराज ने
ताप्तीजी का बड़ा महात्म देखकर सबसे पहले तप्तीजी को आसान प्रदान किया। ताप्तीजी का अधिक महात्म देखकर सब नदियाँ  रुष्ट होकर लौटने लगी ,तो धर्मराज ने सबको प्रणाम कर कहा की नदियों यह तपती सूर्य की पुत्री हैं , सबसे प्रथम हैं , तुम इसलिये क्रोधित हो रही हो ?  यदि तुम्हे मेरे वचनों पर विश्वास नही हो तो  हो  तो मार्कण्डेय मुनी से पूँछ लो !  वो  हि आपकी समस्या का  समाधान कर सकते है क्युकि वे सात कल्पो के बारे मे जानते है । सभी नदियाॅ लोमश मुनि के पास पहुची।
तब लोमश मुनि ने कहा की ताप्ती जी ही सबसे
प्राचिन नदी है , तो सभी जिज्ञासावश
पुछा की हमे तापी जन्म कैसे हुआ बताये ।
तब लौमश ऋषि ने कहाँ की आप ब्रम्हाजी के पास जाये सॄष्टि के रचयिता हि आपको बता पायेंगे । सभी नदियाँ फिर ब्रम्हलोक गयी और विचित्र आसनों पर बैठने के बाद उन सब ने नम्रता पूर्वक  ब्रम्हाजी से पूछा की नदियों मॆ श्रेष्ठ कौन हैं ?  हे  नाथ  तब ब्रम्हाजी ने कहाँ की सूर्यनारायण के शरीर से निकली ताप्ती प्रथम हैं जो की इक्कीस कल्पो का लगातार मुझे  स्मरण हैं ।
इस प्रकार कहने पर हम सभी नदियों ने गर्व छोड़कर
अपनी शंका के बारे मॆ पूछा कि किस तरह सूर्यदेव के शरीर से ताप्ती उत्पन हुयी ।
तब हमे ताप्ती जन्म के बारे मॆ पता चला । हे गिरजापति महादेव अब कृपा करके  मुझे ताप्ती महात्म जानने का रास्ता बताये ।  तब महादेव  बोले , श्री यमुना जी ताप्ती जी की बहन हैं , वह हि बता सकती हैं ताप्ती महात्म और बहन होने के कारण उस पर क्रोध नही करेंगी । बाद मॆ उतावली होकर गंगाजी यमुना जी से मिलने गयी ।  इस प्रकार यमुना जी और गंगाजी मॆ मित्रता हुयी ।
कूछ समय बाद देवी गंगा ने यमुना जी को महादेव जी के पास आने का निमंत्रण दिया  जिससे ताप्ती महात्म जानने का कार्य पूर्ण हो सके । देवाधि देव महादेव ने आदर पूर्वक कहाँ , हे नदियों मॆ श्रेष्ट यमुना !  तुम शीघ्र ताप्ती महात्म सूनावों ।  तब यमुना बोली हे नाथ  ताप्ती जी मेरे बहन होते हुये भी क्रोधित हुयी तो मेरी रक्षा कौन करेंगा । तब महादेव जी ने बोले हे देवी यमुना -  मै हुंकार मार कर तुम्हे बचा लूंगा , ताप्ती के श्राप के भय के कारण इस कार्य को तुम्हारे सिवाय कोई करने मॆ समर्थ नही हैं । यमुना जी ने काली गाय का रुप धारण किया और ताप्ती पूर्णा संगम पर ताप्ती महात्म जानने के लिये प्रवेश किया तब
यमुना जी का दुष्कर्म जानकर सूर्यपुत्री ताप्ती तीव्र वेग प्रवाह से यमुना को व्याकुल कर दिया तब यमुना जी डुबकी खाती हुयी रुदन करती हुई दिखाई दी । तब  स्वयं मैं भी आश्चर्यचकित हुआ और सफेद रंग कि गाय (यमुना) को उस स्थान का ध्यान किया तब वह गाय ताप्ती जी के प्रभाव से सफेद रंग कि हो गई । ऐसा ध्यान से आभास हुआ , तब मैने हुंकार करके उस गाय कि रक्षा की । यमुना जी बार बार ताप्ती जी का ध्यान करते हुये भी ताप्ती महात्म ना पा सकी । कलांतर मॆ इस स्थान का नाम भूसावन पड़ा । ये तीर्थ प्रसिद्ध तपती पूर्णा संगम के नाम से विख्यात हुआ ।
इस तीर्थ का सेवन करने से देवी यमुना और  शिव जी क्रपा बनी रहती हैं l भगवान शिव बोले - हे पुत्र
जब  राजा सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों के मोक्ष के लिये गंगाजी को धरती पर लाने के लिये हजारो वर्ष तक तप किया किंतु गंगाजी धरती पर ना  ला सके , और तप करते करते  उनकी मृत्यु हो गयीं ।
राजा सगर की मृत्यु की सूचना पाकर उनके पुत्र अंशुमान को बड़ा दुख हुआ और अंशुमान ने संकल्प लिया अब मै इस अधूरे कार्य को पूरा करूँगा तथा परंतु कठोर तप करने के बाद भी गंगाजी धरती पर नही आयी । इस तरह राजा सगर की दो पीढ़ीया समाप्त हो गयीं ।
 गंगा जी को धरती पर लाने भागीरथ ने हजारों वर्ष घोर तपस्या की थी. उसके फलस्वरूप गंगा ने
ब्रम्ह कमण्डल (ब्रम्हलोक से) धरती पर भागीरथ के पूर्वजों का उद्धार करने आने का प्रयत्न तो किया परंतु
वसुन्धरा पर उस सदी में मात्र ताप्ती नदी की ही सर्वत्र महिमा फैली हुई थी । ताप्ती नदी का महत्व समझकर
श्री गंगा पृथ्वी लोक पर आने में संकुचित होने लगी, तदोउपरांत भगवान विष्णु स्वयं ब्रम्हलोक मे आये और माॅ गंगा जी से कहने लगे ,हे देवी तपस्वी इंसान को कम-कम एक ही जन्म में वरदान दे देना चाहिये , परन्तु राजा सगर की दो पीढ़ीयाॅ समाप्त हो गयी है, और तीसरी पीढ़ी
भगीरथ के अनेक वर्ष बीत चुके है । हे  देवी कपिल मुनि आपको बुलाना चाहते है तो आपको जाना चाहिये ।
जब कपिल मुनि जैसे तपस्वी नित तुम्हारे जल मे स्नान करगें तो तुम्हारे पाप नित धुलते रहेंगे।अत : हे देवी आप मुत्यु लोक पर जाने की कृपा करे ।
गंगाजी ने भगवान विष्णु जी  की बातो का उत्तर देते हुए
कहा कि भगवन ताप्तीजी मुझसे पहले धरातल पर
उपस्थित है और ताप्तीजी के तेज के सामने मेरा
प्रभाव कम हो जायेंगा । इस पर भगवान विष्णु ने कहा कि पृथ्वी लोक धरातल पर जितने भी ताप्ती पुराण है , उन्हे मृत्यु लोग से बुलाकर स्वर्ग लोक तुम्हारे सामने सामने
रख देते है । इस कार्य से ताप्ती जी का प्रभाव तो कम नही
होंगा। किन्तु उसके महत्व को जानेंगे ही नही तो मानेंगे
कैसे । अत: स्वमेव ही उनका ध्यान व मान कम हो जायेंगा । कपिल मुनि की कृपा से तुम्हारा मान बढ़ते
जायेंगा । इस शर्त पर गंगा जी पृथ्वी पर जाने को तैयार हुई । तब भगवान विष्णु ने नारद जी  और गंधर्व गण की को पृथ्वी लोक पर ताप्ती जी का अदभूत महात्म चुराने भेजा । तब नारद मुनि तथा गंधर्वगणों की टोली सहित सब लोग  श्री ताप्ती जी के तट पर आये और संगीत के साथ लम्बे अंतराल  तक उनकी स्तुति की । उससे प्रसन्न होकर सूर्यपुत्री ताप्ती ने नारद मुनि और गंधर्वगणों की टोली को
दर्शन दिये और कहाँ आप सब किस लिये प्रार्थना कर रहे हो ! आपको तो कूछ भी असाध्य नही हैं ।
मूझे  बहुत आश्चर्य हो रहा हैं । हे देव ऋषि वेद गायन मॆ तत्पर बड़े मुनि आप मेरे पूज्य हैं ।
यदि आप मेरे प्राण भी माँगेगे वह भी दे दूँगी । तब नारद मुनी बोले हे देवी ताप्ती जो तुम्हे प्रिय हैं ,वह आप मुझे नही दे सकती । जो आपको प्राणों से अधिक प्रिय हैं , वही माँगता हूँ ।  हे देवी सूर्यपुत्री यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं ,तो तुम्हारा महात्म मुझे दे दीजिये तो आपकी कृपा होंगी ।
नारद जी के वजन सुनकर श्री ताप्ती जी बोली -हे नारद जी यह महात्म दुर्लभ हैं फ़िर भी मैं तुम्हे दूँगी । नारद जी ने कपट मन से माँगा फिर भी श्री ताप्ती जी ने अपना महात्म दे दिया ,तब नारद मुनि और गंधर्वगणों की टोली सभी ताप्ती महात्म लेकर स्वर्ग गये और देवी गंगा जी के सामने पॄथ्वी लोक के सभी ताप्ती महात्म रख दिये । तब ब्रम्हपुत्री गंगा जी पॄथ्वी लोक पर आयी और राजा भगीरथ के सौ हजार पुत्रों का उद्धार हुआ । बाद मॆ श्री सूर्यपुत्री ताप्ती जी को ज्ञात हुआ की उनका महात्म हरण गया तो श्री ताप्ती जी को क्रोध हुआ जिसके कारण ऋषि नारद को तापी पुराण चुराने की हत्या का पाप लगा और निस्तेज कुष्ठ रोग मुँह वाले हुये साथ हि सब धर्मों से बहिस्कृत हुये । श्री ताप्ती जी क्रोध मॆ अपने पिता सूर्यदेव से भी तेज हो गयी और देवऋषि नारद को कुष्ठ रोग और गंगा जी को अपने हि कुलवंश मॆ वधू बन कर आने तथा उसकी वंश बेल ना बढ़ पाने का श्राप दे गयीं । ताप्ती जी के क्रोध से देवी -देवता दानव और गंधर्व सभी डर गये ।
कही ऐसा ना हो कि उसकी क्रोधाग्नि मॆ एक बार फिर पॄथ्वी जलकर राख ना हो जाये इसलिये माँ पॄथ्वी अपना वजूद बचाने के लिये श्री ताप्ती जी के समक्ष खड़ी होकर  प्रार्थना करने लगी और कहने लगी हे देवी आपने हि मुझे सूर्यदेव के तेज से बचाया जिसके वजह से जल और जीवन सम्भव हुआ । आप हि क्रोधग्नि मॆ दहक उठेंगी तो मेरा तो वजूद हि और जल जीवन दोनो समाप्त हो जायेंगा । हे माँ ताप हारिनि मेरी कोख मॆ पलने वाले जीव -जन्तु आपके भाई मनु कि संतान का क्या होंगा । माँ पॄथ्वी कि प्रार्थना सुनकर सूर्यपुत्री ताप्तीजी ने अपने क्रोध  को  शांत किया ।
भगवान शिव कहने लगे हे पुत्र कार्तिकेय जब नारद मुनि कुष्ठ रोग मुख  वाले ब्रम्हाजी के पास गये  उस समय नारद मुनि को आते देख द्वार मॆ  पर खड़े  वायु देव ने आश्चर्यचकित हो तुरन्त ब्रम्हाजी के पास गये और बोले हे पितामह मुनि श्रेष्ट नारद कुष्ठ रोग वाले ब्रम्हलोक आ रहे हैं ।
तभी ब्रम्हदेव ने घ्यान किया और बोले  श्री ताप्ती जी का महात्म हरण करने कि हत्या लगी हैं । मैं ऐसे अपवाद वाले पुत्र का मुख नही देख सकता हूँ ।मैं समाधि मॆ  जा रहा हूँ ,तुम नारद मुनि से कहना कि इस समय ब्रम्हपिता के तुमसे मिलने का समय नही हैं । ऐसा कहकर ब्रम्हाजी बोले मेरी बनाई कृति का का नाश करने  के लिये मुझसे पूछे बिना नारद ने जो किया और पाया हैं वह कोप से मनुष्य योनि पायेंगे । इस प्रकार ब्रम्हाजी समाधि मॆ बैठ गये ।
जब नारद मुनि आ गये ,तो वायुदेव ने नारद मुनि से कहाँ कि अभी ब्रम्हदेव के पास समय नही हैं । ऐसा सुनकर नारद मुनि ने  ब्रम्हाजी  असमय समाधि जाने जाने का विचार किया । नारद मुनि वहाँ से लौटकर मेरे पास आये पुत्र कार्तिकेय ! तुम्हारी माता पार्वती और मेरी स्तुति कि
और  कहने  लगे  हे कैलाशनाथ  मैं दुष्ट भावना से हूँ  फिर भी आपकी शरण मॆ आया हूँ । हे तीनो लोकों से स्वामी
आप अंतर्यामी हो मुझ पर कृपा कर मुक्ति का कोई मार्ग बताये । तब मैने ध्यान द्रष्टि से सबकुछ लिया और मीठे वचनों मॆ कहाँ नारद तुम ताप्ती जी का पुराण हर कर लाये हो इसलिये तुम्हे कुष्ठ रोग  हत्या लगी  हैं । यह किसी भी तीर्थ मॆ तप्तीजी के प्रभाव के बिना नही जायेंगी । हे नारद मैं ताप्ती जी के तेज और वेग को जानता हूँ ।
उसका कहाँ कल भविष्य को तय करेंगा । मैं स्वयं भी ताप्ती के जल का सेवन करत हूँ । अत :आप गंगाजी के साथ ताप्ती जी कि शरण मॆ जायिये वह शरणागत पर दया करने वाली हैं । वह तुम पर जरूर प्रसन्न होंगी ।
इसके बाद नारद मुनि श्री ताप्ती उदगम मुलतापी आये और गंगाजी का स्मरण किया । नारद मुनि ने 12 वर्ष तक माँ ताप्ती जी का सेवन किया और कठोर तप किया । जिसके बाद माँ सूर्यपुत्री जी जी प्रसन्न हुई ।
माँ ताप्ती कि कृपा से कोप जल गया तभी आकाशवाणी हुई  की हे नारद मुनि आप पाप मुक्त हो गये हो ।
इस स्थान पर आषाढ़ सप्तमी के दिन स्वयं देवी गंगा ताप्ती जी का सेवन करने आती हैं ।
हे पुत्र कार्तिकेय।


पार्ट 03
माँ सूर्यपुत्री ताप्ती जी की जन्म कथा सुनकर
कार्तिकेय जी बोले - हे पिताश्री किस प्रकार देवी ताप्ती का  विवाह हुआ और किसके साथ हुआ कृपा कर बताईये ।
तब भगवान शिव बोले -  संवरण राजा सोमवंश मॆ प्रसिद्ध थे । अगस्त मुनि के श्राप से वरूण देवता मनुष्य योनि मॆ संवरण नाम से आये थे । इसी दौरान जलचरों के स्वामी वरुण देवता के साथ उनका विवाह हुआ ।
शिव आगे कहने लगे - हे पुत्र कार्तिकेय जब देवताओ और दानवो के  बिच क्षीर सागर मॆ समुद्र मंथन चल रहा था तब उस मंथन से मनोहर चौदह रत्न निकले थे ।
उन  चौदह रत्नों मॆ मदिरा निकली तो सब देवताओं ने वरुण देव को दे दी । इन्द्र सभा से निकलकर वरुण देव लंकापुरी के सुंदर द्वार पर आये और अगस्त मुनि के आश्रम को देखा और आनंदित होकर मदिरा पीने के लिये वहाँ गये । अगस्त मुनि के आसन पर बैठकर  वरुण देव ने मधुभाव से मन्दिरा पान किया , उसी समय गंगाजी मॆ  स्नान कर अगस्त मुनि वहाँ आ लगे , जलचरों के स्वामी वरुण देव और मदिरा की बूँदें पड़ी देख -अगस्त मुनि क्रोधित हुये और कहने लगे तूने मेरे आश्रम मॆ अनुचित कार्य किया हैं इसलिए मैं तुम्हे श्राप देता हूँ  , तू पॄथ्वी पर मनुष्य जन्म पायेंगा ।
तब वरूण देव बोले - हे तपस्वी मेरी रक्षा करो मैने अनजाने मॆ यह दुष्ट कार्य किया हैं ,अत : दयालु मुनि कृपा करे ।
इस पर महान अगस्त मुनि बोले हे जलचरों के स्वामी वरुण देव ! पॄथ्वी पर तू अपने पुत्र का मुख देखेंगा उसके बाद तू पुन : अपना स्थान प्राप्त कर लेंगा ।
इसके बाद वह वरूण देव ब्रम्ह के प्रभाव से पॄथ्वी पर जन्मे क्यूकी मुनि द्वारा दिये गये श्राप को भला कौन बदल सकता था । चंद्रवंश मॆ अजमीढ नामक राजा प्रसिद्ध थे उसका वह वरूण देव पुत्र हुआ ।
वरूण देव के आगमन से राजा पौरव को यश कीर्ति बढ़ने के साथ धर्म की रक्षा होने लगी । ज्ञानी पुरुषों मॆ श्रेष्ट उतम गर्ग मुनि ने ज्ञान द्रष्टि से उस बालक को देखकर कहाँ की यह तो वरूण देव हैं  ऐसा जानकर उनका नाम संवरण रखा । गुरु वशिष्ठ से वेदों की शिक्षा प्राप्त कर जब वह सोलह वर्ष का हुआ तब पिता का राज्य प्राप्त कर राजा बनकर प्रजा पालन करने लगा ।
एक दिन  की बात हैं जब राजा संवरण वन मॆ आखेट के लिये गये थे । तब राजा संवरण ने देखा की कमलपुष्प जैसे नेत्र वाली चंद्र बिंब जैसे मुख वाली शंक के समान गर्दन वाली तथा यौवन से झुकी हुई दो सखिया सुमेरू पर्वत को सुशोभित करती हुई आकाश मार्ग से पॄथ्वी लोक पर उतरी । अत्यंत सुंदर रुपवति विमला और ताप्ती को देख काम से घायल होकर उस ताप्ती पर मोहित हो गये संवरण !
तब विश्वसुंदरी ताप्ती से  राजा संवरण बोले मैं महाराज पौरव का पुत्र हूँ ,मुझे अब तक किसी नारी ने आकृष्ट नही किया । हे सुंदरी तुम कौन हो ! तुम देवी हो ,गंधर्व हो या किन्नर हो ! तुम्हे देखकर मेरा चित्त चंचल हो उठा हैं ।मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ । ताप्ती जी ने संवरण की बातो का कूछ भी जवाब दिये बिना कूछ देर तक संवरण को देखती रही और अदृश्य हो गई । ताप्ती जी के अदृश्य हो जाने पर संवरण अत्यधिक व्याकुल हो गये और कहने लगे सुंदरी तुम कहाँ चली गई ? तुम्हारे बिना मै जीवित नही रह सकुंगा । तुम्हारे  सौंदर्य ने मेरा मन चुरा लिया हैं । तुम प्रकट होकर मूझे बताओ की तुम कौन हो और मै तुम्हे कैसे पा सकुंगा। इतना कहकर राजा संवरण मूर्छित हो गिर पड़े । ऐसा सुनकर ताप्ती जी प्रकट हुई और  संवरण की ओर देखते हुये बोली  हे राजन ! मैं स्वयं आप पर मोहित हूँ ,किंतु  मैं अपने पिता के आज्ञा के वश मॆ हूँ । मैं सूर्य की छोटी पुत्री हूँ और मेरा नाम ताप्ती हैं । जब तक मेरे पिता आज्ञा नही देंगे तब तक मैं आपसे विवाह नही कर सकती । यदि  आपको मुझे पाना हैं तो मेरे पिता को प्रसन्न करना होंगा । ताप्ती जी अपने कथन समाप्त करते हुये अदृश्य हो गई । संवरण ताप्ती जी को पुकारते - पुकारते धरती पर गिरकर बेहोश हो गये । जब उनकी चेतना वापस आई तो उन्हे ताप्ती जी स्मरण हो आई । सूर्यदेव को प्रसन्न करने हेतु परीक्षा संवरण की रगों मॆ विघुत तरंगे दौड़ उठी । अत : ताप्ती जी को पाने के लिये राजा संवरण ने कठोर तप करना आरम्भ किया अंत मॆ सूर्यदेव ने संवरण की भक्ति से प्रसन्न होकर राजा संवरण की परीक्षा लेने का विचार उत्पन किया । रात्रि के समय सन्नाटा छाया हुआ । राजा संवरण सूर्यदेव की तपस्या में लीन थे । सहसा उनके कानो मॆ किसी की आवाज आई संवरण तू यहाँ ध्यान मॆ मग्न हैं , तेरी राजधानी अग्नि मॆ जल रही हैं ।  संवरण नेत्र बंद किए ध्यान मुद्रा मॆ संवरण चुपचाप अपनी जगह बैठे रहे ! उनके मन मॆ मात्र भी दुख पैदा नही हुआ । उनके कानो मॆ पुन :आवाज सुनाई दी । संवरण तेरे कुटुम्ब के लोग अग्नि मॆ जलकर मर गये । संवरण हिमालय के समान दृढ़ होकर अपने स्थान पर जमे रहे । उनके कानो मॆ पुन :तीसरी बार कंठ स्वर सुनाई पड़ा - संवरण तेरी प्रजा अकाल की अग्नि मॆ जलकर भस्म हो रही हैं । तेरे नाम की थू थू हो रही हैं ! उतना सुनकर भी राजा संवरण दृढ़तापूर्वक तप मॆ लगे रहे । संवरण की दृढ़ता देख सूर्यनारायण प्रसन्न हुये और उन्होने प्रकट होकर कहाँ  " संवरण मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ । बोलो तुम्हे क्या चाहिये । संवरण सूर्यदेव को प्रणाम करते हुये बोले हे भगवन मुझे आपकी पुत्री ताप्ती को छोड़कर और कूछ भी नही चाहिये । कृपा करके मुझे तपती को देकर मेरे जीवन को कृतार्थ कीजिये । सूर्यनारायण ने प्रसन्नता की मुद्रा मॆ कहाँ संवरण मैं सब जानता हूँ , ताप्ती भी तुमसे प्रेम करती हैं । हे  संवरण आपके गुरु वशिष्ठ मेरे पास आये थे  और उन्होने सम्पूर्ण स्थति मुझे बताई उन्होने ताप्ती की तुम्हारे लिये याचना की तब मैने उनके साथ ताप्ती को भेज दिया तुम्हारा कल्याण हो  ।  कूछ समय बाद गुरु वशिष्ठ ताप्ती जी को  साथ लेकर आये । गुरु वशिष्ठ जी के निर्देश पर राजा संवरण और ताप्ती जी ने पाणिग्रहण  संस्कार किया तथा वशिष्ठ जी  ने विवाह कर्म करवाया । इस तरह सूर्यदेव ने अपनी पुत्री राजा संवरण को शौप दी ।
इस तरह ताप्ती संवरण राजधानी पहुँचे । गुरु वशिष्ठ के निर्देश पर संवरण ने उत्तम नियम वाले ब्राम्हणों को बुलाया तथा राजा संवरण द्वारा विनय पूर्वक किये दान और सम्मान से पूजित संतुष्ट हुये ब्राम्हणों ने राजा को आशीर्वाद दिया ।
वहाँ रहकर ताप्ती सहित चिरकाल दिव्य भोगों को भोगा जब पुत्र हुआ तब पुत्र का मुख देख राजा संवरण श्राप मुक्त हुये और अपने पुत्र को ताप्ती जी को सौंप अपने स्थान को प्राप्त किये । ताप्ती जी उनके पुत्र का नाम कुरु रखा और  कूछ समय बाद वे भी अपने स्थान चली गई ।

पार्ट 4
शिव जी बोले - हे  पुत्र कार्तिकेय ! जब श्री ताप्ती जी के पुत्र राजा कुरु ने इस क्षेत्र  की बार बार हल चलाकर जुताई  कर रहे थे , तब इन्द्र ने उनसे जाकर इसका कारण पूछा। कुरु ने कहा कि जो भी व्यक्ति इस स्थान पर मारा जाए, वह पुण्य लोक में जाए, ऐसी मेरी इच्छा है। इन्द्र उनकी बात को हंसी में उड़ाते हुए स्वर्गलोक चले गए।
ऐसा अनेक बार हुआ। इन्द्र ने अन्य देवताओं को भी ये बात बताई। देवताओं ने इन्द्र से कहा कि यदि संभव हो तो कुरु को अपने पक्ष में कर लो। तब इन्द्र ने राजा कुरु के पास जाकर कहा कि कोई भी पशु, पक्षी या मनुष्य निराहार रहकर या युद्ध करके इस स्थान पर मारा जायेगा तो वह स्वर्ग का भागी होगा। इन्द्र की बात मान कर राजा कुरु ने हल चलाना बंद कर दिया । ये बात भीष्म, कृष्ण आदि सभी जानते थे, इसलिए महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में लड़ा गया। कुरुवंश की बढायी इसलिये नही है  कि उसने कुरुक्षेत्र राज्य कि सीमायें कैलाश से लेकर सागर तक फैला दी थी। राजा कुरु कि बढायी इसमॆ भी है कि उन्होने ठीक अपने राज दरबार कि मिट्टी मॆ प्रजातंत्र का पहला बीज डाला तथा जन्म और कर्म बिच मॆ एक रेखा डालकर ये कहाँ की जीवन का अर्थ जन्म नही है, कर्म है । 
हे पुत्र...जिस तरह राजा कुरु के शासन मॆ धर्मक्षेत्र कर्मक्षेत्र का जो अंकुर फूटा था कूछ समय बाद हस्तनापूर मॆ नरेश शांतनु के शासन काल मॆ मुर झा गया ।
गंगाजी को आखिर शांतनु के संग विवाह  करके ताप्ती जी की पौत्र वधू बनना स्वीकार करना पढ़ा ।
जब गंगाजी पटरानी बनकर हस्तनापूर मॆ आई तो सारे राज्य मॆ दुखों का पहाड़ गिर गया । राजा शांतनु गंगाजी के प्रेम मॆ इतने लिप्त हो गये की उनके प्रजा की थोड़ी सी भी चिंता ना रही । आखिर वो दिन आ गया जब गंगा जी ने बालक  को जन्म दिया ,गंगा जी ने उस बालक को जन्म लेते उसे नदी मॆ बहा दिया । राजा शांतनु वचन बद्ध होने के कारण देखते रहे की एक माँ ही अपने बालक को जन्म लेते ही नदी मॆ बहा रही है । कि प्रजा मॆ हा हा कार मच गया । गंगाजी जैसी दुर्भाग्य माता को सारी प्रजा कोसने लगी । हस्तनापूर कि सारी प्रजा नये युवराज कि प्रतीक्षा देख रही थी । प्रजा ने तो यहाँ तक कह दिया कि यह स्त्री ही नही है ,इसमे स्त्री के तीन गुणों मॆ से एक भी गुण नही है ,ना चेतना ,प्रेरणा और ना ही उत्साह है । महाराज ने कैसे स्त्री को हमारी पटरानी बना के रखा । इस तरह आठवें पुत्र के के वक्त राजा शांतनु ने अपने दिये वचन को तोड़ा और अपने सातो  पुत्रों कि मृत्यु का कारण पूछा - तब गंगा जी बोली - हे महाराज मैंने आपके सातो पुत्रों कि हत्या नही की है , मैंने उन्हे गुरु वशिष्ठ के श्राप से मुक्त कराया है । मैं ब्रम्हपुत्री गंगा आपके साथ एक श्राप जी रही हूँ ।  तब राजा शांतनु बोले - कैसा श्राप देवी मुझे सह विस्तार बताये ।
गंगाजी बोली- महाराज आपके पितामह  राजा गुरु की माता श्री ताप्ती जी ने मुझे उनके वंश वे वधू बनकर आने और वंशबेल ना बढ़ पाने का श्राप दिया था ।
ऐसा सुनकर महाराज शांतनु बोले - देवी क्या हमारे इस आठवें पुत्र से भी वंशबेल नही बढ़ पायेँगी ।
गंगाजी बोली -महाराज इस पुत्र का नाम मैं देवव्रत रख रही हूँ ,यह पुत्र भी आपकी वंश बेल नही बड़ा पायेंगा ।
गंगाजी और महाराज शांतनु के आठवें पुत्र को अखंड ब्रम्हचर्य की भीष्म प्रतिज्ञा लेना पड़ा ।  हे  पुत्र ! शास्त्रों मॆ कहाँ गया है कि यदि भूलवश अनजाने से किसी मृत देहकी हट्टी ताप्ती जल मॆ प्रवाहित हो जाती है , तो उस मृत आत्मा को मुक्ति मिल जाती है । जिस प्रकार महाकाल के दर्शन करने से अकाल मौत नही होती है ,ठीक उसी प्रकार किसी भी जल मॆ प्रवाहित करने या उसका अनुसरण करके उसे तापी जल मॆ प्रवाहित किये जाने से अकाल मृत का शिकार बनी आत्मा को भी प्रेत योनी से मुक्ति मिल जाती है ।
इस तरह श्री ताप्ती का दिया सिध्द हुआ ।

पार्ट 5
शंकर भगवान बोले -हे पुत्र कार्तिकेय  ! जिस जगह पर ताप्ती जी के पुत्र कुरु ने तप किया था वह आगे चलकर कुरुक्षेत्र / धर्म  क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
कार्तिकेय जी  बोले - यहाँ चंद्रवंश मॆ उत्पन्न प्रसिद्ध ताप्ती जि के पुत्र ने किसलिये तप किया था ? 
 तब भगवान शिव बोले - हे  कार्तिकेय 
जब राजा संवरण ने अपने पुत्र का मुख देख लिया और अपने स्थान को प्राप्त किये तथा ताप्ती जी भी अपने स्थान पर चली गई ।
 राज्य सुख भोगने के बाद राजा कुरु चिंतित रहने लगे और विचार करने लगे ,यह अवतार निर्थक हैं कि उनकी कोई कीर्ति नही हैं । इस तरह चिंतित राजा कुरु को एकाएक नारद मुनि के दर्शन हुये । राजा कुरु ने भक्ति पूर्वक महात्मा नारद   के चरण मॆ प्रणाम किया ।
तब देव ऋषि नारद बोले हे वीर तुन्हारे मन मॆ जो इच्छा हैं वह तुम्हे प्राप्त हो और तुम सदा प्रसन्न रहो ।
राजा कुरु ने नारद मुनि से पूछा कि मेरा मनोरथ सिध्द हो ऐसा उपाय बताईये ।
नारद मुनि बोले बोले हे पुत्र वारितापिनी तीर्थ के पश्चिम मॆ मनुष्य को हर सिध्दि  देने शंकर जी का शिवलिंग हैं ,उस तीर्थ पर तू जा वहाँ जलपान करने से मोक्ष प्राप्त होता हैं । वहाँ जाकर तू तप कर ।
नारद मुनि से आज्ञा लेकर राजा कुरु यही  पर आये और श्री ताप्ती जी को प्रसन्न करने के लिये महतप किया । राजा  कुरु के महातप से प्रसन्न होकर श्री ताप्ती जी राजा कुरु के सामने प्रकट हुई  । तब राजा कुरु ने ताप्ती जी को प्रणाम करते हुये उनकी स्तुति कि तब ताप्ती जी मधुर वचन मॆ बोली हे पुत्र   ! जो तीनो लोको मॆ दुर्लभ हो वह वर आज मैं तुम्हे दूँगी । हे वीर पुत्र तू दृढ़ निश्चय वाला तथा पराक्रम वाला और सत्यव्रत वाला  हैं । राजा कुरु बोले हे देवी आप मुझ पर प्रसन्न हुई हो तो तीनो लोकों मॆ चिरकाल तक मेरी कीर्ति बनी रही ॥ यही वरदान मुझे दो । श्री ताप्ती जी बोली हे पुत्र कुरु नाम से यह क्षेत्र प्रसिद्ध होंगा और मेरे प्रभाव से इस क्षेत्र मॆ प्राणी पाप से मुक्त होंगे ।
हे पुत्र पॄथ्वी पर जो पुरुष जो पुरुष कुरुक्षेत्र मॆ जाकर पाप रत होंगा तो मैं पुत्र कि तरह उसका उद्धार करूँगी ।
सुंदर कुरुक्षेत्र मॆ सूर्यग्रहण के समय स्नान करने से जो पुण्य मिलता हैं उससे करोडो गुणा अधिक पुण्य ताप्ती के कुरुक्षेत्र मॆ स्नान करने से मिलता हैं । बाद मॆ ताप्ती ने राजा कुरु को मनोरथ की सिद्धि  दी ।  यहाँ  के जल मॆ कुरुतीर्थे्श्वर नामक शिवलिंग हैं जिसका सात दिन रात सेवन करने से कौन स्वर्ग नही जायेंगा । इस कुरु तथा  ताप्ती संगम का सेवन करने से क्षय रोगी कुष्ठ रोगी बहरे गूंगे आदि कृतार्थ होती हैं ।
 इतना कहकर ताप्ती देवी अंतरध्यान हो गयी । राजा कुरु ने अपने राज दरबार की मिट्टी मॆ प्रजातंत्र का पहला बिच डाला और जन्म और कर्म के बिच एक रेखा डालकर ये कहाँ की जीवन का अर्थ जन्म नही कर्म हैं क्यूकी कुरुक्षेत्र वास्तव मॆ धर्मक्षेत्र हैं । आगे चलकर राजा कुरु का विवाह ने स्वर्ग की अप्सरा सुकेशी के साथ हुआ ॥
 राजा कुरु सूर्यनारायण के अनन्य भक्त थे उनकी कृपा से कुरु ने कुरुक्षेत्र बसाया । माँ ताप्ती पूत्र राजा कुरु एक अत्यंत प्रतापी राजा हुये जो महभारत मॆ कौरव और पांडवों के पितामह हुये ।



                      पार्ट - 06
शिव जी बोले - हे  पुत्र कार्तिकेय ! जब श्री ताप्ती जी के पुत्र राजा कुरु ने इस क्षेत्र  की बार बार हल चलाकर जुताई  कर रहे थे , तब इन्द्र ने उनसे जाकर इसका कारण पूछा। कुरु ने कहा कि जो भी व्यक्ति इस स्थान पर मारा जाए, वह पुण्य लोक में जाए, ऐसी मेरी इच्छा है। इन्द्र उनकी बात को हंसी में उड़ाते हुए स्वर्गलोक चले गए।
ऐसा अनेक बार हुआ। इन्द्र ने अन्य देवताओं को भी ये बात बताई। देवताओं ने इन्द्र से कहा कि यदि संभव हो तो कुरु को अपने पक्ष में कर लो। तब इन्द्र ने राजा कुरु के पास जाकर कहा कि कोई भी पशु, पक्षी या मनुष्य निराहार रहकर या युद्ध करके इस स्थान पर मारा जायेगा तो वह स्वर्ग का भागी होगा। इन्द्र की बात मान कर राजा कुरु ने हल चलाना बंद कर दिया । ये बात भीष्म, कृष्ण आदि सभी जानते थे, इसलिए महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में लड़ा गया। कुरुवंश की बढायी इसलिये नही है  कि उसने कुरुक्षेत्र राज्य कि सीमायें कैलाश से लेकर सागर तक फैला दी थी.राजा कुरु कि बढायी इसमॆ भी है कि उन्होने ठीक अपने राज दरबार कि मिट्टी मॆ प्रजातंत्र का पहला बीज डाला तथा जन्म और कर्म
बिच मॆ एक रेखा डालकर ये कहाँ की जीवन का अर्थ जन्म नही है, कर्म है । 
हे पुत्र...जिस तरह राजा कुरु के शासन मॆ धर्मक्षेत्र कर्मक्षेत्र का जो अंकुर फूटा था कूछ समय बाद हस्तनापूर मॆ नरेश शांतनु के शासन काल मॆ मुर झा गया ।
गंगाजी को आखिर शांतनु के संग विवाह  करके ताप्ती जी की पौत्र वधू बनना स्वीकार करना पढ़ा ।
जब गंगाजी पटरानी बनकर हस्तनापूर मॆ आई तो सारे राज्य मॆ दुखों का पहाड़ गिर गया । राजा शांतनु गंगाजी के प्रेम मॆ इतने लिप्त हो गये की उनके प्रजा की थोड़ी सी भी चिंता ना रही । आखिर वो दिन आ गया जब गंगा जी ने बालक  को जन्म दिया ,गंगा जी ने उस बालक को जन्म लेते उसे नदी मॆ बहा दिया । राजा शांतनु वचन बद्ध होने के कारण देखते रहे की एक माँ ही अपने बालक को जन्म लेते ही नदी मॆ बहा रही है ।
कि प्रजा मॆ हा हा कार मच गया । गंगाजी जैसी दुर्भाग्य माता को सारी प्रजा कोसने लगी । हस्तनापूर कि सारी प्रजा नये युवराज कि प्रतीक्षा देख रही थी । प्रजा ने तो यहाँ तक कह दिया कि यह स्त्री ही नही है ,इसमे स्त्री के तीन गुणों मॆ से एक भी गुण नही है ,ना चेतना ,प्रेरणा और ना ही उत्साह है । महाराज ने कैसे स्त्री को हमारी पटरानी बना के रखा ।
इस तरह आठवें पुत्र के के वक्त राजा शांतनु ने अपने दिये वचन को तोड़ा और अपने सातो  पुत्रों कि मृत्यु का कारण पूछा :-
तब गंगा जी बोली - हे महाराज मैंने आपके सातो पुत्रों कि हत्या नही की है , मैंने उन्हे गुरु वशिष्ठ के श्राप से मुक्त कराया है । मैं ब्रम्हपुत्री गंगा आपके साथ एक श्राप जी रही हूँ । 
तब राजा शांतनु बोले -कैसा श्राप देवी मुझे सह विस्तार बताये ।
गंगाजी बोली- महाराज आपके पितामह  राजा गुरु की माता श्री ताप्ती जी ने मुझे  उनके वंश वे वधू बनकर आने और वंशबेल ना बढ़ पाने का श्राप दिया था ।
ऐसा सुनकर महाराज शांतनु बोले -देवी क्या हमारे इस आठवें पुत्र से भी वंशबेल नही बढ़ पायेँगी ।
गंगाजी बोली -महाराज इस पुत्र का नाम मैं देवव्रत रख रही हूँ ,यह पुत्र भी आपकी वंश बेल नही बड़ा पायेंगा ।
गंगाजी और महाराज शांतनु के आठवें पुत्र को अखंड ब्रम्हचर्य की भीष्म प्रतिज्ञा लेना पड़ा ।  हे  पुत्र ! शास्त्रों मॆ कहाँ गया है कि यदि भूलवश अनजाने से किसी मृत देहकी हट्टी ताप्ती जल मॆ प्रवाहित हो जाती है , तो उस मृत आत्मा को मुक्ति मिल जाती है । जिस प्रकार महाकाल के दर्शन करने से अकाल मौत नही होती है ,ठीक उसी प्रकार किसी भी जल मॆ प्रवाहित करने या उसका अनुसरण करके उसे तापी जल मॆ प्रवाहित किये जाने से अकाल मृत का शिकार बनी आत्मा को भी प्रेत योनी से मुक्ति मिल जाती है ।
इस तरह श्री ताप्ती का दिया सिध्द हुआ ।

पार्ट - 07
शिव जी भोले - हे पुत्र ! भगवान श्री कृष्ण के स्वर्गलोक प्रस्थान करते ही महापराक्रमी पाँच पाण्डव अभिमन्मु पूत्र परीक्षित को राज्य देकर महाप्रयाण हेतू उत्तराखण्ड की ओर चले गये ,वहा जाकर पुण्यलोक को प्राप्त हुए । उसके बाद राजा परीक्षित की साँप के डंसने से मृत्यु हुई जिसका बदला लेने के लिये उनके पुत्र ने महाविनाशी सर्प यज्ञ किया था । श्री ताप्ती जी की कृपा से राजा  जन्मेजय ने सर्प विनाश महायज्ञ से हुई आत्म ग्लानि से  शांति पाई ।
कार्तिकेय जी बोले - हे प्रभु !   राजा परीक्षित को सर्प ने क्यों काँटा ? महाविनाशी सर्प यज्ञ किस प्रकार हुआ । मुझे सह विस्तार कहिये  !
  शिव जी बोले -हे पुत्र ! एक दिन राजा परीक्षित ने सुना
कि कलियुग उनके राज्य में घुस
आया है और अधिकार जमाने का
मौका ढूँढ़ रहा है। ये उसे अपने
राज्य से निकाल बाहर करने के
लिये ढूँढ़ने निकले। एक दिन इन्होंने
देखा कि एक गाय और एक बैल
अनाथ और कातर भाव से खड़े हैं और
एक शूद्र जिसका वेष, भूषण और
ठाट-बाट राजा के समान था,
डंडे से उनको मार रहा है। बैल के
केवल एक पैर था। पूछने पर परीक्षित
को बैल, गाय और राजवेषधारी
शूद्र तीनों ने अपना अपना परिचय
दिया। गाय पृथ्वी थी, बैल धर्म
ता और शूद्र कलिराज। धर्मरूपी
बैल की सत्य, तप और दयारूपी
तीन पैर कलियुग ने मारकर तोड़
डाले थे, केवल एक पैर दान के सहारे
वह भाग रहा था, उसको भी तोड़
डालने के लिये कलियुग बराबर
उसका पीछा कर रहा था। यह
वृत्तांत जानकर परीक्षित को
कलियुग पर बड़ा क्रोध हुआ और वे
उसको मार डालने को उद्यत हुए।
पीछे उसके गिड़गिड़ाने पर उन्हें
उसपर दया आ गई और उन्होंने उसके
रहने के लिये ये स्थान बता दिए—
जुआ, स्त्री, मद्य, हिंसा और
सोना । इन पाँच स्थानों को
छोड़कर अन्यत्र न रहने की कलि ने
प्रतिज्ञा की। राजा ने पाँच
स्थानों के साथ साथ ये पाँच
वस्तुएँ भी उसे दे डालीं—मिथ्या,
मद, काम, हिंसा और बैर। इस घटना
के कुछ समय बाद महाराज
परीक्षित एक दिन आखेट करने
निकले। कलियुग बराबर इस ताक में
था कि किसी प्रकार परीक्षित
का खटका मिटाकर अकंटक राज
करें। राजा के मुकुट में सोना था
ही, कलियुग उसमें घुस गया। राजा
ने एक हिरन के पीछे घोड़े को दौड़ाया बहुत दूर तक पीछा करने पर भी वह न
मिला। थकावट के कारण उन्हें
प्यास लग गई थी। एक वृद्ध मुनि
(शमीक) मार्ग में मिले। राजा ने
उनसे पूछा कि बताओ, हिरन
किधर गया है। मुनि मौनी थे,
इसलिये राजा की जिज्ञासा
का कुछ उत्तर न दे सके। थके और
प्यासे परीक्षित को मुनि के इस
व्यवहार से बड़ा क्रोध हुआ।
कलियुग सिर पर सवार था ही,
परिक्षित ने निश्चय कर लिया
कि मुनि ने घमंड के मारे हमारी
बात का जवाब नही दिया है और
इस अपराध का उन्हें कुछ दंड होना
चाहिए। पास ही एक मरा हुआ
साँप पड़ा था। राजा ने कमान
की नोक से उसे उठाकर मुनि के गले
में डाल दिया और अपनी राह
ली।
मुनि के श्रृंगी नाम का एक
महातेजत्वी पुत्र था। वह किसी
काम से बाहर गया था। लौटते
समय रास्ते में उसने सुना कि कोई
आदमी उसके पिता के गले में मृत सर्प
की माला पहना गया है।
कोपशील श्रृंगी ने पिता के इस
अपमान की बात सुनते ही हाथ में
जल लेकर शाप दिया कि जिस
पापत्मा ने मेरे पिता के गले में मृत
सर्प की माला पहनाया है, आज
से सात दिन के भीतर तक्षक नाम
का सर्प उसे डस ले। आश्रम में पहुँचकर
श्रृंगी ने पिता से अपमान
करनेवाले को उपर्युक्त उग्र शाप देने
की बात कही। ऋषि को पुत्र के
अविवेक पर दुःख हुआ और उन्होंने
एक शिष्य द्वारा परीक्षित को
शाप का समाचार कहला भेजा
जिसमें वे सतर्क रहें। परीक्षित ने
ऋषि के शाप को अटल समझकर
अपने पुत्र जनमेजय को राज पर
बिठा दिया और सब प्रकार मरने
के लिये तैयार होकर अनशन व्रत
करते हुए श्रीशुकदेव जी से श्रीमद्
भागवत की कथा सुनी।
राजा परीक्षित ने हर मुमकिन
कोशिश की कि उनकी मौत
सांप के डसने से न हो। उन्होंने सारे
उपाय किए ऐसी जगह पर घर
बनवाया जहां परिंदा तक पर न
मार सके। लेकिन ऋषि का शाप
झूठा नहीं हो सकता था। जब
चारों तरफ से राजा परीक्षित ने
अपने आपको सुरक्षित कर लिया
तो एक दिन एक ब्राह्मण उनसे
मिलने आए। उपहार के तौर पर
ब्राह्मण ने राजा को फूल दिए
और परीक्षित को डसने वला वो
काल सर्प ‘तक्षक’ उसी फूल में एक
छोटे कीड़े की शक्ल में बैठा था।
तक्षक सांपो का राजा था।
मौका मिलते ही उसने सर्प का
रुप धारण कर लिया और राज
परीक्षित को डस लिया।
राजा परीक्षित की मौत के
बाद राजा जनमेजय हस्तिनापुर
की गद्दी पर बैठे। जनमेजय पांडव
वंश के आखिरी राजा थे।
जनमेजय को जब अपने पिता की
मौत की वजह का पता चला तो
उसने धरती से सभी सांपों के
सर्वनाश करने का प्रण ले लिया
और इस प्रण को पूरा करने के लिए
उसने सर्पमेध यज्ञ का आयोजन
किया। इस यज्ञ के प्रभाव से
ब्रह्मांड के सारे सांप हवन कुंड में
आकर गिर रहे थे।
 उन यज्ञों में
नागों को पटक दिया जाता था। एक
विशिष्ट मंत्र द्वारा नाग स्वयं यज्ञ के
पास पहुंच जाते थे। देशभर में नागदाह
नामक स्थानो पर यज्ञ चालु कर दिये ।
कोई-कोई एक कोस लम्बे तथा कोई चार
कोस लम्बे, कोई केवल गाय के कान जैसे
प्रमाण वाले सर्प बड़ी तेजी से अग्रिकुण्ड में
भस्म हो रहे थे। इस प्रकार लाखों, करोड़ों-
अरबों सर्प मंत्राकर्षण से विवश होकर नष्ट
हो गए। कुछ सर्पों की आकृति घोड़े की
सी, किसी की हाथी की सूंड की सी,
मतवाले हाथी जैसे विशाल नाग, भयंकर
विष वाले छो-बड़े अनेको सर्प ।
 सर्पदाह के एक
घनघोर यज्ञ की अग्नि से एक कर्कोटक
नामक सर्प ने अपनी जान बचाने के लिए
उज्जैन में महाकाल राजा की शरण ले ली
थी जिसके चलते वह बच गया था।
लेकिन सांपों
का राजा तक्षक, जिसके काटने
से परीक्षित की मौत हुई थी, खुद
को बचाने के लिए सूर्य देव के रथ से
लिपट गया और उसका हवन कुंड में
गिरने का अर्थ था सूर्य के
अस्तित्व की समाप्ति जिसकी
वजह से सृष्टि की गति समाप्त
हो सकती थी।
सूर्यदेव और ब्रह्माण्ड की रक्षा
के लिए सभी देवता जनमेजय से इस
यज्ञ को रोकने का आग्रह करने लगे
लेकिन जनमेजय किसी भी रूप में
अपने पिता की हत्या का बदला
लेना चाहता था।
 जनमेजय के
यज्ञ को रोकने के लिए
अस्तिका मुनि को हस्तक्षेप
करना पड़ा, जिनके पिता एक
ब्राह्मण और मां एक नाग कन्या
थी।
अस्तिका मुनि की बात
जनमेजय को माननी पड़ी और
सर्पमेध यज्ञ को समाप्त कर तक्षक
को मुक्त करना पड़ा।
 उसके ही प्रयासों से वह महासर्प
विनाशी यज्ञ बंद हो गया
और वासुकि, तक्षक आदि नागों की
रक्षा हुई। दोषी-निर्दोष सभी सर्पों
की महान् हिंसा से राजा जन्मेजय के हृदय
में अत्यंत ग्लानि हुई। उसी कुण्ठा से
कुण्ठित राजर्षि जन्मेजय अधीरतापूर्वक कृष्ण द्वैपायन व्यास जी के समीप
गए और अपना दुख निवेदन  किया। उनके दुख
निवारण को  व्यास जी बोले- वत्स!
संसार में संपूर्ण पाप-ताप का निवारण
भगवती पुण्य सलिला ताप्ती  की शरण ग्रहण करने से हो
जाता है; चाहे वह ताप किसी भी
निमित्त उत्पन्न हुआ हो।
आषाढ़ शुक्ल सप्तमी के दिन व्यास जी के बताये निर्देश पर मां ताप्ती के तट पर महा पुंजन का आयोजन किया । जिसमें
देवता, गन्धर्वगण, किन्नर समूह, नागगण,
सिद्धगण, चारणों के समूह और मनुष्यों के
झुण्ड सभी को भक्ति के भाव-प्रवाह में
निमग्र हो गये। आकाश में बादल भी
भावविभोर होकर दिव्य जल की धीमी-
धीमी फुहार छोड़ रहे थे, और भक्तों का
समूह गन्ध, अक्षत व धूप दीपमाला द्वारा
पूजन कर रहा था। सिद्ध चारण दिव्य
स्त्रोतों के द्वारा भगवती सूर्यपुत्री
तपती की स्तुति कर रहे थे। गन्धर्व गण अनेक
प्रकार के वाद्ययंत्रों को बजाकर ललित
कण्ठ से उनकी कीर्ति का गान कर रहे थे।
अप्सराएं नृत्य कर रही थीं।

तपती पूजन के बाद मां ताप्ती जी को जन्मेजय द्वारा सुहाग सामग्री भेट कर दुग्धाभिषेक किया गया ।
उपरांत एक वटवृक्ष के नीचे उच्च व खण्ड
पर काले हिरण की मृगछाला के आसन पर
हजारों मुनियों से घिरे श्री कृष्ण द्वैपायन
व्यास आनंद में विराज रह थे, तब परीक्षित
नंदन जन्मेजय ने प्रणाम करके पूछा- हे सर्वज्ञ
गुरुदेव! सम्पूर्ण पाप-ताप का हरण करने
वाली परम कृपामयी तापी मांई सम्पुर्ण महात्म बताईये ।