शनिवार, 12 अक्टूबर 2019

माँ रेणुका शक्तिपीठ जमदारा जिला भिण्ड


आदिशक्ति विश्व माता श्री रेणुका देवी की महिमा अपरम्पार है । धन्य है वह माता जिनके गर्भ से सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु हरी ने परशुराम रूप में जन्म लिया ।
रेणुका भवानी माता के भारतवर्ष में सैकड़ो शक्तिपीठ विद्यमान है जहाँ माता ने अपने भक्तो की पुकार पर अनेक लीलाएँ रची । माँ रेणुका देवी जिन्हें भारत वर्ष के घर - घर में कुलदेवी के रूप में पूजा जा रहा है जिससे माता को कूलस्वामिनी नाम से पुकारा जाता है । प्रिय भक्तजनों भिण्ड जिले के जमदारा गांव में माँ रेणुका देवी कैसे आयी और माँ रेणुका देवी ने इस जमदारा की पावनधरा पर कैसे कैसे करिश्में दिखाए तो चलिए माँ रेणुका की इस मानसिक यात्रा का लाभ उठाने हमारे । माता रेणुका का जन्म से पूर्व का नाम अदिति था । माँ अदिति ने सैकडो वर्ष तक भगवान शिव शंकर की कठोर तपस्या की । तब देवी अदिति की तपस्या से भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हे दर्शन दिये और कहने लगे हे देवी आप आदिशक्ति के रूप में कन्नौज के रेणु (प्रसेन्न्जित ) राजा के जन्म लेकर पाँच पुत्रो की माता का सुख प्राप्त करोगी । आपके एक पुत्र के रूप में स्वयं श्री विष्णु भगवान जी अवतार लेगे जिससे आपका एकवीरा नाम विश्व प्रख्यात होगा । आप पर श्रध्दा रखने वाले भक्तो की रक्षा के लिए आप जहाँ जहाँ प्रकट होगी दर्शन देकर भक्तों उद्धार करोगी  वहां वहां आप शक्ति स्वरूपा के रूप में सदा सदा के बस जाओगी । वहां शक्तिपीठ रूप में अनंतकाल तक आपकी पूजा होती रहेगी । आपकी महिमा का भक्तजनों पर इस तरह प्रभाव होगा की भक्त आपको कुलदेवी के रूप में पूजन करेंगे ।
कुछ समय बाद राजा रेणु प्रसेन्न्जित के घर छोटी पुत्री के रूप में  रेणुका देवी का जन्म हुआ। राजा रेणु ने अपनी  दो सुंदर पुत्रियो में एक का नाम नैनुका तथा दूसरी पुत्री का नाम रेणुका रखा । कहते है की एक बार राजा ने अपनी दोनो पुत्रियों से प्रश्न किया कि वो किसका दिया अन्न ग्रहण करती है। जिसके जवाब मे नैनुका ने कहा कि वह अपने पिता का दिया अन्न ग्रहण करती  है। जबकि रेणुका ने जवाब दिया कि वह भगवान का दिया और अपने नसीब का अन्न ग्रहण करती  हूँ। रेणुका के जवाब से राजा रेणु अप्रसन्न हो गए और उन्होने रेणुका को सबक सिखाने का निर्णय कर लिया। कुछ समय पश्चात राजा ने अपनी बडी पुत्री नैनुका का विवाह बडी धूम-धाम से एक पराक्रमी राजा सहस्त्रबाहु से कर दिया और छोटी पुत्री रेणुका को सबक सिखाने के लिए रेणुका का विवाह एक सीधे साधे तपस्वी ऋषि जमदग्नि से कर दिया। देवी  रेणुका राजसी ठाठ-बाट मे पली बढी थी। फिर भी उसने ऋषि जमदग्नि को अपना पति परमेश्वर स्वीकार किया और तन मन से उसकी सेवा करने लगी। ऋषि  जमदग्नी और माँ रेणुका अपने परिवार के साथ किसी कारणवश हिमालय से मध्यप्रदेश के जानापाँव मे आ गये । उस समय पृथ्वी पर क्षत्रिय राजाओं का आतंक एवं अत्याचार बढ़ गया, तब सभी लोग इन राजाओं द्वारा त्रस्त हो गये । ब्राह्मण व साधु असुरक्षित हो गये। धर्म कर्म आदि के कामों में  छत्रीय राजा व्यवधान उत्पन्न करने लगते थे। ऐसे समय में भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि 'पुत्रेष्टि यज्ञ' सम्पन्न करते हैं, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव वरदान स्वरूप उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान देते हैं । कुछ समय बाद उनकी पत्नी रेणुका के गर्भ से उन्हें पांचवे पुत्र के रूप मे वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन परशुराम का जन्म हुआ  ।
परशुराम जी भगवान विष्णु के आवेशावतार थे। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम, जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजीद्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम कहलाये
ऋषि जमदग्नि की पत्नि रेणुका एक पतिव्रता एवं आज्ञाकारी स्त्री थीं। वह अपने पति के प्रति पूर्ण निष्ठावान थीं। महर्षि जमदग्नि जी अपने परिवार के साथ जानापाँव में रहते थे इसी पावन भूमि पर परशुराम जी जन्म हुआ । जानापाँव से 55 कि .मी दूरी  स्थित महेश्वर नगरी मे राजा सहस्त्रार्जुन का राजमहल था जिसके द्वारा ब्राम्हणों पर किए जा रहे अत्याचारो से दुःखी होकर ऋषि जमदग्नि ऋषि ने अपने गुरुकुल आश्रम कें शिष्यों एवं अपने पांच पुत्रो तथा धर्मपत्नी रेणुका कें साथ भिण्ड जिले के जमदारा गाँव पर आकर रहने लगे । जमदग्नि ऋषि ने जमदारा आश्रम से होकर सिन्धु नदी तक एक गुफा का निर्माण कराया था ।
आश्रम से होते हुए एक सुरंग सीधी सिन्धु नदी पर जाती थी
आश्रम से होते हुए एक सुरंग सीधी सिन्धु नदी पर जाती थी जहाँ से रेणुका माता कच्चे मिट्टी के घडे मे जल भर कर लाती थी रेणुका माता , नाग का आला बना कर कच्चा घडा सिर पर रखकर जल लाती ,  जिस जल से स्नान करके ऋषि जमदग्नि मुनि हवन यज्ञ पूजा आरम्भ करते थे।। कहते है एक बार जमदारा के आश्रम से माँ रेणुका यज्ञ के लिये जल लेने के लिए इसी गुफा से सिन्ध नदी पर गई थी , जहाँ पर गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। उसे देखकर रेणुका उस दृश्य पर ध्यान मग्न हो गई थी , जिसके वजह से जमदग्नि जी कों यज्ञ हवन में देरी हो गई ।  इस तरह जल लाने में विलंब हो जाने से यज्ञ का समय समाप्त हो गया था तब मुनि जमदग्नि ने अपनी योग शक्ति द्वारा पत्नी के मर्यादा विरोधी आचरण को देखकर अपने चार पुत्रों को माता का वध करने की आज्ञा दी,  उन्होंने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चार बेटों को माँ की हत्या करने का आदेश दिया। किंतु कोई भी तैयार नहीं हुआ। जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को जड़बुद्ध होने का शाप दिया। पिता की आज्ञा स्वरूप परशुराम ने माँ का वध कर दिया । परशुराम जी की पितृ भक्ति देख कर पिता जमदग्नि उसे वर माँगने को कहते है तब परशुराम जी पिता से वरदान माँगते हैं कि वह उनकी माता को क्षमा कर उन्हें जीवित कर दें तथा सभी भाईयों को भी चेतना युक्त कर दें । तब जमदग्नि रेणुका माँ को अपने तपोबल से जीवित कर देते है और चारो बेटो को भी श्राप मुक्त कर देते ।
जमदारा की भूमि पर माँ रेणुका का सिर काटने से बहे रक्त कों आज भी देखा जा सकता है जो आज भी एक कीट पत्थर कें रूप मे माँ रेणुका मन्दिर मे विराजमान है वही जमदारा से 40 कि .मी दूरी पर स्थित आलमपुर स्थान पर माता रेणुका कें सिर कि पूजा कि जाती है। मान्यता है की माता रेणुका का सिर काटने कें दौरान जमदारा से आलमपुर आकर गिरा था । रेणुका माता की बड़ी बहन सहस्त्रार्जुन की पत्नी थी । माता रेणुका की सुंदरता पर मोहित होकर सहस्त्रार्जुन देवी रेणुका को पाने कें लिये अनेक प्रयत्न करने लगा । इस तरह सहस्त्रार्जुन ने अपनी शक्ति  का दुरूपयोग करना करना आरम्भ कर दिया , कुरुकुल आश्रमों को तोड़ना , आग लगाकर जलाना और आश्रमों मे स्थित धन सम्पदा को लुटकर राजकीय खजाने मे डालना । सहस्त्रार्जुन ने एक बार ऋषि जमदग्नि आश्रम की 200 गाए चोरी कर ली वही आश्रम कुरुकुल पर एक बड़ा कर भी लगाना आरम्भ कर दिया । इसी बीच आचार्य वशिष्ट जी का जमदग्नि आश्रम मे आगमन हुआ जो गुरुकुल मे पढ़ रहे विद्यार्थियों एवं जमदग्नि परिवार कें भरण पोषण की पूर्ति कें लिये कामधेनु गाय महर्षि जमदग्नि जी को भेंट कर गए।  ऐसे अत्याचारों को देखकर परशुराम भगवान ने पापियों को सजा दिलाने कें अस्त्र उठा लिये । किन्तु पिता कें विचारो कें विरूद्ध जाने की वजह से उन्हे आश्रम छोड़कर जाना पड़ा ।
 एक बार सहस्त्रार्जुन ने अपने चार पुत्रो को जमदग्नि ऋषि के आश्रम में साधुओं कें रूप मे जाकर परशुराम का पता लगाने को कहाँ , महर्षि जमदग्रि ने सहस्त्रार्जुन कें पुत्रो को साधुओं कें रूप आये मेहमान समझकर स्वागत सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ी | महर्षि ने उस गाय के मदद से कुछ ही पलों में देखते ही देखते चारो पुत्रो के भोजन का प्रबंध कर दिया | कामधेनु के ऐसे विलक्षण गुणों को देखकर सहस्त्रार्जुन कें पुत्रो को ऋषि जमदग्नि  के आश्रम कें आगे अपना राजसी सुख कम लगने लगा। उसने मन में ऐसी अद्भुत गाय को पाने की लालसा जागी।
सहस्त्रार्जुन को जब चारो पुत्रो ने कामधेनु की सच्चाई बताई तो उसने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु को मांगा। किंतु ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु को आश्रम के प्रबंधन और जीवन के भरण-पोषण का एकमात्र जरिया बताकर कामधेनु को देने से इंकार कर दिया। इस पर सहस्त्रार्जुन ने क्रोधित होकर कामधेनु को ले अपने राजा दरबार चला गया और जमदग्नि मुनि पर तलवार से कई बार प्रहार भी किया ।
सहस्त्रार्जुन कें पुत्रो ने कामधेनु से मनचाहे सामग्री मांगी किन्तु कामधेनु माता कें कुछ भी प्रदान नही किया ऐसे मे राजकुमारो को लगा की जमदग्नि ऋषि ने उन्हे असली कामधेनु नही दी है इससे क्रोधित होकर चारो राजकुमार जमदग्नि आश्रम आये तब देवी  रेणुका के सामने ही उसके  पतिदेव जमदग्नि की हत्या कर दी और माँ रेणुका रोते रोते परशुराम परशुराम पुकार रही थी ।  तब माँ रेणुका ने परशुराम को बताया की सहस्त्रार्जुन के बेटो  ने तुम्हारे पिता की हत्या की है । यह देखकर परशुराम बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने शपथ ली कि वह हैहय वंश का ही सर्वनाश नहीं कर देंगे बल्कि उसके सहयोगी समस्त क्षत्रिय वंशों का 21 बार संहार कर भूमि को क्षत्रिय विहिन कर देंगे।
तभी एक ऋषि का आगमन हुआ और उन्होने माँ रेणुका और परशुराम को बताया की सहस्त्रार्जुन के पास मृत्यु संजीवनी है अगर तुम उसे मारकर मृत्यु संजीवनी वापस लाते हो तो तुम्हारे पिता पुन : जीवित हो जायेगे ।
सहस्त्रार्जुन का वध करने कें लिये परशुराम जी मऊ कें किले की गए इस तरह भयभीत होकर सहस्त्रार्जुन ने जमीन मे छुपने की योजना बनाई जो परशुराम जी को ज्ञात हुई तो उन्होने मऊ क्षेत्र की सारी जमीन ही पलटी कर दी । आज मऊ मे जमीन खुदाई के दौरान उल्टी वस्तुएँ दिखाई पड़ती है वही यहां आदिकाल से शवों को उल्टा लेटाकर हि जलाया जाता है । भगवान परशुराम सहस्त्रार्जुन  का वध कर मृत्यु संजीवनी को अपने साथ लेकर आते है जिसके प्रभाव से जमदग्नि जीवित हो जाते है ।  तब ऋषि जमदग्नि माँ रेणुका से कहते की देवी आपकी सभी परीक्षायें पूर्ण हुई ।  आप सदा के इस धरती लोक के वासियो के यहाँ निवास करोगे ।
कहते है की भिंड जिले का मौ क्षेत्र में दैविक शक्तियो का सदैव वास रहा हैं।साथ ही यह क्षेत्र अपने भीतर भगवान परशुराम का इतिहास समेटे हुए है।  जिला मुख्यालय से 64 किलोमीटर दूरी पर जमदारा गांव है। कहते है की ऋषि जमदग्नि आश्रम के स्थान पर पहले एक गुफा हुआ करती थी। जो जमदारा गांव से स्योंढ़ा गांव तक जाती थी। जिसकी लंबाई 9 किलोमीटर थी। लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से करीब 50 साल पहले गुफा को बंद कर दिया॥
जो भी भक्त माँ रेणुका देवी ही यह पावन कथा श्रध्दा के साथ सुनता है और माता के भक्तों कों सुनाता है माँ रेणुका देवी की कृपा से उसके सारे मनोरथ पूर्ण होते है ।

संकलनकर्ता - श्री रविन्द्र कुमार मानकर 

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

छावंल की माँ रेणुका की कहानी


       जय माँ रेणुका माता मन्दिर छावल 
            जिला बैतूल मध्यप्रदेश  


आमला नगर से लगभग 10 कि .मी. की  दूरी पर वो आदिशक्ति माँ दुर्गा का पावन दरबार है जहाँ रेणुका माता की कृपा से प्रतिदिन किसी न किसी भक्त की मनोकामना पूरी होती ही रहती है । जिस छावल रेणुका मन्दिर मे आज भक्तगण सिर झुका रहें है वही ईश्वर अपनी लीलाए रची थी । जहाँ सैकड़ो की संख्या में श्रध्दालु श्री रेणुका माता कें दर्शन करने आते हैं ।
देवी रेणुका भगवान परशुराम की जननी है । माँ हर रूप में धन्य है लेकिन जिस माँ ने साक्षात नारायण को जन्म दिया , उनकी महिमा तो देवताओ से भी बढ़कर है । देवी रेणुका ने इस संसार को परशुराम जैसा उपहार दिया था उनके इस उपहार को नमन कर रहा है सूर्यपुत्री ताप्ती नदी और सतपुड़ा की गोद में बसा ये प्राचिन छावल माता मन्दिर ।
यहाँ अपनी वैभवशाली सत्ता कें साथ विराजी रेणुका देवी की भक्ति में, उपासना में , जीवन कें चार पुरुषार्थ छिपे हुए , इसीलिए भक्तगण देवी की आराधना करना ही धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष्य को प्राप्त करना समझते  हैं । यहां की छावल रेणुका माता की जो भी भक्त सच्चे मन से भक्ति पूर्वक पांच यात्राएं करता हैं , माँ की कृपा से उसकी मनोकामना पूरी हो जाती हैं । इसीलिए छावलवाली माता को कल्प वृक्ष कें रूप में पूजा जाता हैं ।
देवी कें बारे में यहाँ कें लॊगॊ की मान्यता हैं की ,  माँ रेणुका देवी दिन में तीन बार रूप बदलती है। सुबह माता का मुख बाल्य मंडल अर्थात बाल्य अवस्था का होता हैं , दोपहर में मुख मण्डल युवा स्वरूप दिखाई देता हैं और शाज ढलते वृध्दा अवस्था का दिखाई देता हैं ।कहते है कि आज से लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व छावल गांव की पहाड़ी पर एक सन्त महात्मा तप किया करते थे । गांव कें आस पास जंगल  घना होने कें कारण यहां जंगली हिंसक जानवर विचरण किया करते थे ।जिसके वजह गांव में यह बाते फैली हुई थी की जिस पहाड़ी पर साधु महात्मा साधना कर रहें वहां शेर घूमते रहता है । इस तरह सन्त महात्मा ने देवी की कई वर्षो तक साधना की । एक दिन सन्त महात्मा को सपना आया , माँ जगदम्बा ने कहाँ की सामने की पहाड़ी पर पत्थर को चीरकर मेरी मूर्ति प्रकट हुई है । तुम जाकर पहाड़ी पर मेरी मूर्ति की खोज करो और इस गांव कें भक्तो को मेरी सेवा करने कें लिए कहो । माँ जगदम्बा ने आगे कहाँ बालक मेरे भक्त मूझे एकवीरा , रेणुका , कूलस्वामिनी ,जगदम्ब, आदिशक्ति, माहूरगढ़ देवी, यल्लमा देवी आदि नामो से पुकारते है । मैं ही जगत माता हु , जगकल्याणी हु । इस छावल गांव में प्रकट होने की वजह से मेरे भक्त मूझे छावलवाली रेणुका माता कें नाम से जानेंगे । इस तरह वह सन्त महात्मा , छावल गांव कें लोगों से मिलकर स्वप्न में माता कें बताए आदेश को बता रहें थे कि सन्त महात्मा को देखकर गांव कें लॊगॊ की भीड़ जुट गई । गांव कें कुछ जागरूक लोंगो ने सन्त महात्मा की बातो पर गौर करते हुए मूर्ति की तलाश करने का निर्णय लिया। इस तरह सन्त महात्मा कें साथ गांव कें लोग जंगल की पहाड़ी पर मूर्ति की तलाश करने लगे । मूर्ति की तलाश करते हुए झाड़ियों कें बीच माता रेणुका देवी की स्वयं भू प्रकट हुई मूर्ति मिली  । जो स्वयं पत्थर को चीरकर प्रकट हुई थी । माता की मूर्ति को देख गांव कें लोंगो की खुशी का ठिकाना नहि रहा । सारे गांव कें लोग माँ रेणुका की भक्ति करने लगे । आस पास कें गांव कें को माँ रेणुका कें प्रकट होने की सुचना मिली तो भक्तो की भीड़ स्वयं भू प्रकट हुई माता की मूर्ति देखने कें लिए जुटने लगी । छावल गांव कें माँ रेणुका पर अटूट श्रध्दा आस्था रखने वाले भक्तो ने यहां अश्विन और चैत्र नवरात्रि पर मेले का आयोजन करना आरम्भ किया । दूर दूर से भक्तगण माँ रेणुका देवी कें दर्शन आते और दान पेटी में कुछ दान डालते उसी धनराशि से छावल गांव कें भक्तजनों ने माँ रेणुका देवी का प्यारा सा मन्दिर बनाया । छावल गांव कें भभूत गिरी परिवार कें एक भक्त द्वारा माँ रेणुका देवी कें मन्दिर की देखरेख व माँ रेणुका की सेवा करना आरम्भ किया । इनके स्वर्गवास कें बाद इनके पुत्र लक्ष्मण गिरी ने माँ रेणुका मन्दिर में सेवा दी । लक्ष्मण गिरी भक्त कें देहांत कें बाद उनके पुत्र गणेश गिरी और पूरण गिरी द्वारा वर्तमान में छावल माता की सेवा की जा रही है ।
एक बार की बाद है मोहनगिरी महाराज सोए हुई थे तब उन्हे  रात्री 3 बजे करीब माँ रेणुका देवी का स्वप्न आया । तभी गणेश गिरी जी ने स्नान किया और माँ रेणुका कें दर्शन कें मन्दिर गए । मन्दिर पहुंचते ही माँ की प्रतिमा कें सामने फैले प्रकाश को देखकर भयभीत हो गए , जब माता कें मूरत कें सामने पहुंचे तो माँ रेणुका बाल्य स्वरूप में विराजमान थी उनके सेवा दों बड़े शेषनाग ,सफेद रंग का चूहा , एक बिच्छू उपस्थित थे । यही कारण है की श्रध्दालु अपनी मनोकामना लेकर आते है और माँ से वरदान पाते है ।

 कुछ दिन पूर्व की बात है आमला कें पेट्रोल पम्प पर काम करने वाले एक मजदूर को डाँक्टर ने गले में कैंसर की बीमारी बताई थी ।मजदूर कें पास पैसे न होने की वजह से बहुत दुःखी था और वह मजदूर माँ रेणुका कें दर्शन को छावल आया । मन्दिर कें पुजारी गणेश गिरी महाराज को जब मजदूर ने अपनी पीड़ा बताई  तब गणेश गिरी महाराज ने मजदूर को माँ रेणुका देवी कें अखण्ड ज्योत का तेल और हवन कुण्ड की भभूति निकालकर दे दी । मजदूर गणेश महाराज कें बताए अनुसार अखण्ड ज्योत कें तेल से गले की मालिश की और कुछ ही दिनो मे पहले जैसा सेहत में सुधार आ गया । जब डाँक्टर कें पास जाकर पुनः कैंसर  की जांच की तो कैसर पूरी तरह समाप्त हो गया था । डाँक्टर ने जब मजदूर से पूछा की यह चमत्कार कैसे हुआ तब मजदूर ने कहाँ की यह चमत्कार छावल की माँ रेणुका की कृपा से हुआ है । डाँक्टर कें होश उड़ गए जब उसने माँ की महिमा का चमत्कार स्वयं अपनी आंखो से देखा ।.डाक्टर की मन में भी जिज्ञासा हुई माँ रेणुका दर्शन की और माँ रेणुका दर्शन को छावल जा पहुंचा । शास्त्रों में सच ही कहाँ है आस्था का पग उजालों से भरा हुआ है । आपको धर्म प्रचार प्रसार मंच की यह सत्य घटना पर आधारित कहानी कैसे लगी अवश्य बताए ।

इसी कहानी कों दिल्ली की राशि खन्ना जी की मधुर आवाज में रिकॉर्ड किया हैं जो बहुत जल्द आप सभी के बीच Ambadevi Films युटुब चैनल के माध्यम से आने वाली हैं ।
















धर्म प्रचार प्रसार मंच का माँ रेणुका छावल मन्दिर कीर्ति जन जन पहुचाने का अभियान आरम्भ हो चुका हैं .
..जय जगदम्बा





संकलनकर्ता (कहानीकार ) महाकाल भक्त रविन्द्र मानकर 

शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

श्री रेणुका महिमा एलबम सहयोग सूची

धामनगांव की माँ रेणुका देवी की महिमा पर तैयार ऐतिहासिक पौराणिक आडियो व वीडियो भजन एलबम निर्माण कार्य हेतु अब तक इन सभी धर्म प्रेमी भाईयो द्वारा स्वेच्छाणुसार सहयोग दिया गया

*)अर्पिता तनु मिश्रा - जबलपुर ( फ्री गायन )
*) रवि सोनी - जबलपुर (फ्री गायन )

*)शोभना कश्यप - भोपाल ( फ्री गायन)
*) गोविन्द सिंग बेनाम - जबलपुर  (फ्री गायन )
*)प्रज्ञा साहु - गुरूग्राम ( फ्री गायन )
*) वर्षा पंडोले -बैतूल - ( फ्री गायन )
*)नूपुर मौर्य - बैतूल ( फ्री गायन )
*)पाठक छायांकन - बैतूल ( फ्री वीडियो शूट )
*)रवि धोटे - धामनगांव (फ्री वीडियो शूट )
 
*) काजल फोटॊ स्टूडियो - भैसदेही - (फ्री कैमरा )
*)शैलेन्द्र यादव - आठनेर - ( फ्री वीडियो शूट )
* )रविन्द्र मानकर - सावंगी - ( all song वीडियो एडीटिंग)
*)कैलाश तारानी - देवास -( वीडियो एडिटिंग )
 
*) साक्षी शर्मा - देवास ( अभिनय सहयोग )
*)निलेश दोडकें - धामनगांव ( विशेष सहयोग )
1)मनोहर वाडेकर अमरावती घाट -5001/-
2)शोभना कश्यप - भोपाल - 3000 /-
3 ) महेश्वर दोडके - धामनगांव -2100/-
4)  टी .आर अमरगडे -धामनगांव -1511/-
5)भोजराज साकरे - धामनगांव- 2151/-
 6) ज्ञानेश धोटे - धामनगांव-1151/-
7) राजेश दोडके - धामनगांव-1111/-
8) नितिन धोटे - धामनगांव -1101/-
9) गगन बघेल - अमरावती घाट -1101/-
10) संदीप साकरे - धामनगांव -1101/-
11) हरिराम अमरघडे - धामनगांव -1101/-
 12) ज्ञानदेव पांसे - धॉमनगॉव-1101/-
 13) मानिकराव अमरघडे - धामनगांव-1101/-
 14) संजय उइके - धामनगांव -1101/-
 15) अजय अमरघडे - धामनगाँव - 1100
16) पांडुरंग अमरघडे - धॉमनगॉव-1100/-
17) विनोद पटेल - धामनगांव-1100/-
 18) पंकज कटारे - धॉमनगॉव-1001/-
 19) प्रतीक लहरपुरे - धॉमनगॉव-1001/-
20)  हेमंत सातपुते - भिलाई-1001/-
21) युवराज  कापसे - हिवरा -1001/-
22) शिवम  तराडे - धॉमनगॉव- 1001/-
23) रितेश दोडके - धॉमनगॉव-551/-
24) बंटी बारस्कर - बैतूल -551/-
25) विट्ठल बारमाशे - धामनगांव-551/-
26) कमलेश अमरघडे -धामनगांव-511/-
27) केशव राव दोडके - धामनगांव -511/-
28) राधेश्याम यादव - खामला -501/-
29) संदीप धॉधोडे - सुरगांव -501/-
30) गौरव पारधे -भरकावाडी-501/-
31)तुषार अमरघडे - धामनगांव -501/-
32) योगेश बनकर - बैतूल - 501/-
33) अजय धोटे - सातनेर-501/-
34) योगेश साहू - धामनगांव -501/-
35) अनिल बारमाशे - धामनगांव-501/-
36) पंकज राठौर - भैसदेही -501/-
37) देवीदास लोखण्डे - घोघामा - 501/-
38) गणेश अमरघडे - धामनगांव -501/-
39) प्रवीण दवण्डे - एनखेड़ा -501/-
40) रिंकेश टेकपुरे - हिडली-501/-
41) राजेश साकरे - धामनगांव-501/-
42) विनोद अमरघडे - धॉमनगांव -501/-
43) सत्यवान अमरघडे - धामनगांव-501/-
44) यशवंत गिरी महाराज - धामनगांव -500/-
45) दिनेश वागद्रे - धामनगांव -500/-
46) कमलेश धोटे - धामनगांव-500/-
47) सचिन बारस्कर - गुदगांव -500/-
48)अज़ाब लिखितकर -  सावंगी-500/-
49) शंकर चरपे - धामनगांव-500/-
50) भरत लहरपुरे -धामनगाँव - 225/-
51) व्यंकटराव दोडके- धामनगाँव - 200/-
52)  पारस लहरपुरे -धामनगाँव 200/-
53) दौलतराव अमरघडे - धामनगाँव - 151/-
54) लवलेश आजाद-धामनगाँव - 151/-
55) हेमराज पांसे-धामनगाँव - 151/-
56) नारायण साहू - इदौर-110/-
57) उमराव सोनारे - जामगॉव-105/-
58) राजेश बसंतपुरे - धामनगाँव -101/-
59) विनोद कटारे - धामनगाँव - 101/-
60) रमेश गीद- धामनगाँव - 101/-
61) गुलाबराव धोटे - धामनगाँव - 101/-
62) गंगाराम देशमुख- धामनगाँव - 101/-
63) नितिन बारमाशे- धामनगाँव 101/-
64) रामु दोडके- धामनगाँव-100/
65) मदन धोटे-धामनगाँव- 100/-
66) जितेन्द-धामनगाँव -100/-
67) तुलसीराम मोहकर -धामनगांव 100/-
68) साहेबलाल गढेकर- सचिव - 80/-
69) विकास लाडे -धामनगाँव - 51/-
70) प्रवीण धाडसे-धामनगाँव - 51/-
71) भोलाराम साहू-धामनगाँव - 51/-
72) केशऱ धोटे-धामनगाँव -51/-
73) कैलाश बुवाडे-धामनगाँव - 51/-
74) गावंडे जी-धामनगाँव - 51/-
75) बी.पी तिवारी-धामनगाँव -51/-
76) सुरेन्द्र सुर्यवंशी-धामनगाँव - 51/-
77) सुरेश खातरकर-धामनगाँव -51/-
78) अमरघडे फर्निचर-धामनगाँव -51/-
79) अरविन्द मालवीय-धामनगाँव -51/-
80) सीताराम चिल्हाटे-धामनगाँव -51/-
81) सचिन भोजे-धामनगाँव -51/-
82) अजय धोटे-धामनगाँव -51/-
83) बाबुलाल आजाद-धामनगाँव -51/-
84) कपिल कटारे-धामनगांव - 51/-
85) सुदामा राजगुरू-धामनगांव -51/-
86) रामदास गीद-धामनगांव - 51/-
87) बलदेव पांसे-धामनगांव - 51/-
88) रूपम बसंतपुरे-धामनगांव - 51/-
89) शंकर बसंतपुरे-धामनगांव - 51/-
90) मॉ गायत्री जनरल स्टोर - धामनगांव - 51/-
91) रामचन्द्र साहू -धामनगांव - 51/-
92) कुवर पालीवाल - धामनगांव - 51/-
93) तरूण साहू - धामनगांव - 51/-
94) विनोद कनाठे - धामनगांव - 51/-
95) दिगम्बर धोटे - धामनगांव -50/-
96) सोनू साहू -धामनगांव - 50/-
97) प्रदीप जाट-धामनगांव - 21/-
98) प्रभुजी चिल्हाटे - धामनगांव -21/-
99) रामचन्द्र चिल्हाटे- धामनगांव -21/-
100) वागद्रे किराणा -धामनगाँव  - 21/-
101) रमेश चिल्हाटे- धामनगाँव -  21/-
102) निलेश साकरे- धामनगाँव  21/-
103) रेणुका रूप सृंगार-धामनगाँव - 21/-
104) जगदीश बसंतपुरे-  धामनगाँव -21/-
105) शेषराव धोटे- धामनगाँव - 20/-
106) माणिकराव देशमुख - धामनगाँव - 20/-
107) जगदीश अलोने- धामनगाँव -11/-
108) भुपेन्द्र अमरघडे- धामनगाँव - 11/-
109) शुभम धोटे - धामनगाँव -11/-
110) योगेश सराटकर-धामनगाँव- 11/-
111) सुजल सराटकर-धामनगाँव -11/-
112) रामहरि साहू- धामनगाँव -10
113) विकास ईवने - गेहूँ बारसा - 251/-
114) राजू मर्सकोले -बैतूल - 251/-
115 - मस्तराम कुशवाह - खंडवा - 100
116) मनोज सोलंकी - बैतूल - 251
116) अलकेस मस्की - सेलगाँव - 251
117) उमेश गावंडे - गायखाम
118) रवि शर्मा - नागदा -101/-
119) निलेश धोटे - धामनगाँव - 1151
120) नामदेव धोटे धामनगाँव - 1000
121)  गणपति बारस्कर - बिसनुर -501
123) किशोर साहू - हरियाणा - 4000/-
124) हेमंत देशमुख - कोर्टखेडी - 1000/-
125) अशोक कापसे - हिवरा -1000/-
धर्म प्रचार - प्रसार मंच इन सभी सहयोगी भक्तो आत्मीय रूप से आभार व्यक्त करता हैं । कुछ ऐसे भी भक्त हैं जिनका माँ रेणुका कें पुनीत कार्य मे वक्त दान किया हैं धर्म प्रचार प्रसार मन्च उन सभी भाईयो का बहुत बहुत धन्यवाद व्यक्त करता हैं । जिन दो लॊगॊ ने माँ रेणुका महिमा मे दिया अपना सहयोग मांगा था उन्हे सम्मान कें साथ वापस दे दिया हैं । किसी भक्त का नाम सहयोग सूची से छूट गया हो तो अवश्य बताए । अगर आप हमारे ब्लॉग मे आपके नाम कें आगे आपकी फोटॊ लगाना चाहते हो हमे व्हा्ट्सअप (9806284177) पर फोटॊ भेजे । माँ रेणुका का कोई भी कार्य हो बिना परीक्षा का होता ही नहि इसलिए भूलवश कोई गलती उदेश्य से भटककर किसी हुई हो तो माँ से एक क्षमा प्रार्थना अवश्य करे ।

राष्ट्रीय धर्म प्रचार प्रसार मंच भारत ( एशिया )
राष्ट्रीय धर्म प्रचारक - रविन्द्र मानकर 

शनिवार, 20 जुलाई 2019

धर्म प्रचार - प्रसार मंच के गीत रचनाएं

First Album Bhajan List

 दोहा
आल्हा ऊदल दोऊ गये रे , मां शारद के द्वार
और अकबर ज्वाला गये , पा गये मुक्ति द्वार
ध्यानु गये मां वैष्णवी रे , पाए भक्ती अपार
जो ध्यावे श्री अम्बे मां , तर जाये भव पार

(1)
श्री गणेश का सुमिरन करके, मां अम्बे का ध्यान लगाय ।
मात सरस्वति तुम्हे मनाऊं , मेरे कंठ विराजो आय ।
भुल चुक जो भी हो जाये ,  करना माता क्षमा प्रदान ।
मां अंजनी के राज दुलारे , पहरे पर बैठे हनुमान ।
मंगला देवी तुम्हे मनाऊ , रखना माता मेरी शान ।
हे देवन के देव महादेव , रखना लाज मेरी भगवान ।
कथा सुनाउ मां अम्बे की , सुनियो श्रोता चतुर सुजान ।
लिखवे नाम बनावे आल्हा , महिमा चांदनी रही बखान ।
(2)
मातेश्वरी अम्बा माई की , गाथा सुनलो ध्यान लगाय ।
सतपुडा पर्वत पर है बिराजी , धारुड वालीमात कहाय।
शिव के ससुर थे दक्ष प्रजापति ,यज्ञ दिये थे शुरु करवाय ।
नही निमंत्रण शिव को भेजे ,ये अपमान सहा न जाय ।
सती कुद पडी हवन कुण्ड मे , यज्ञ दियो विध्वंस कराय ।
सती शव लेके शिवजी धुमे , सतपुडा पर्वत पर है आय ।
अंग सती के गिरे धरनी पे , तब से धारुड धाम कहाय ।
जै जै कार हो अम्बे मां की ,भगत सभी है ध्यान लगाय ।
(3)
म.प्र बैतुल जिले मे , बैठी माता आसन मार ।
सारे जगत मे तेरी मैया ,होय भवानी जै जैकार ।
गुफा के अन्दर बैठी हो अम्बे ,करके मां सोलह सिंगार ।
मंगला मां की बनी समाधि ,जिनको पुजे सब नर नार ।
भक्त कहे मां राधा जिनको ,मां शक्ति का है अवतार ।
जिनके गुरु श्री सुरदास थे ,उनसे शिक्षा मिलि अपार ।
शिवधाम मे बैठके गुरुवर ,भक्ति का करते संचार ।
धारुड आठनेर मे गुंजे ,मां राधे की जै जैकार ।
(4)
भक्ति की शक्ती बडी मैया , करती राधे मां हरसाय
जंगल बियाबान मे धुमे , कैसी लिनी लगन लगाय ।
प्यास लगी इक दिन मैया को , पानी कही नजर ना आय ।
बिन पानी के मां राधे का , चेहरा रहा देख मुरझाय ।
एक गुफा दिखलाई उनको , राधे मां गई है हरसाय ।
मन ही मन मे सोच रही है , यहाँ पानी पीने मिल जाय ।
पहुची गुफा के अन्दर मंगला , देख अचम्बा गई चकराय।
बैठी गुफा मे अम्बे रानी, जिसकी महिमा कही ना जाय ।
(5)
मां अम्बे के दर्शन करके , मन अन्तर की बुझ गई प्यास।
 ऐसी मोहित भई मैया पे, पानी बिन जो रही हतास।
इसी गुफा मे करती ,भुल गई है दिन और रात ।
ऐसी लगन लगी मैया से , मैया चारो तरफ दिखात।
1970 की भक्तो तुम्हे सुनाती हुँ मै बात ।
 कृपा करी जगदम्बा मैया , जिनकी महिमा कही न जात ।
राधे मां की भक्ती देखकर , मां की शक्ति गई समाय ।
तेज बडा मस्तक पे इतना , जिसकी प्रसंशा की ना जाय ।
(6)
कई वर्षौ तक करी तपस्या ,अपने मन मे धीरज धार
अन्न का दाना छोड़ दिया है,फल पत्तो का किया आहार ।
राधे मां को दर्शन देने , आ गई अम्बे सिंह सवार ।
दर्शन करके जगदम्बा के , मंगला बोली जै जैकार ।
कहन लगी जगदम्बा मैया , बेटी सुन ले वजन हमार ।
तेज जन्म हुआ है मंगला , जन-जन का करने उध्दार ।
जो भी इस दरबार मे आये , उसकी सुनना करुण पुकार ।
दुखियो के दु:ख दर्द मिटाना ,भक्तो के भरना भण्डार
(7)
गाय चराने को आते थे , दुर दुर से यहाँ पे ग्वाल ।
इक दिन प्यास लगी ग्वाले को , पानी की करे तलाश ।
इसी गुफा मे पहुच गया है ,जल की मन मे लेकर आस ।
राधे मां को देख के ग्वाला ,करने लगा है अरदास ।
कहाँ से आई हो तुम मैया,किसकी बैठी ध्यान लगाय ।
सारा हाल सुना राधा मां , उस ग्वाले से कहा समाझाय।
सारी गाथा सुनकर ग्वाला ,अपने गाँव गया है आय।
गांव-गांव मे पीट डिंढोरा ,घर घर सबको रहा बताय।
(8)
सावंगी और हिवरा गांव के , जुडने लागे भक्त तमाम।
केशो भाई चले है देखो , राधे मां का लेते नाम ।
गोंडी घोघरा के नरनारी बोलत , चल दिये जै जैकार ।
पावन गुफा के पाये दर्शन , माता का कीन्हा दीदार ।
मां मंगला के संग भक्तो ने गुप्त गुफा मे किया प्रवेश ।
मां अम्बे के करके दर्शन , कट गये सबके कठिन कलेश।
देख के भक्ति मां राधे की , दिन दुना फैला परचार ।
म.प्र.बैतुल जिले में , होवे मां की जै जैकार ।
(9)
राधे मां ने करने यात्रा ,अपने मन मे ली है ठान ।
चली है तीरथ करने मैया ,हाथ धर्म का लिये निशान।
एक सरोवर मिला मैया को ,बैठे जहाँ शंकर भगवान ।
श्री गणेश और पार्वती की ,प्रतिमा सुन्दर मिली महान ।
कुछ ही दुर मे काली मां का ,सुन्दर मिला एक स्थान ।
फल फुलो का लगा बगीचा ,जिसकी कही न जाये ना शान।
उस बगीचे मे बैठे साधू , माता का कर रहे थे ध्यान ।
मंगला को उन साधु ने ,अभय दे दिया वरदान ।
(10)
ऐसी पावन गुफा की भक्तो ,गाथा तुमको दई सुनाय ।
मंगला माता बडी तपस्वी ,राधा माता बोली जाय।
इस मन्दिर मे अमावस पुणो ,होती भक्तो भीड़ अपार।
दुर दुर से नर और नारी आकर करते है दीदार ।
जिसकी जो भी मनोकामना ,यहां पर आ पुरी हो जाय ।
उसकी भर जाती है झोली ,जिसने ली है लगन लगाय।
रहत  कडोंदा और कटंगा , माता दई बेनाम बनाय।
राधा मां का नाम सुमरके ,चांदनी सबको दई सुनाय।
जय अम्बादेवी

Second Album Bhajan List

आओ सुनाऊँ तुमको महिमा मां ताप्ती के नाम की  ।
महिमा गजब निराली है इनके पावन धाम की ।
जय ताप्ती मैया...जय ताप्ती मैया...

प्रिय भक्तो पुण्य सलिला ताप्ती माँ जो युगों युगों और  कल्पो -कल्पो से सूर्यदेव के बाहों मॆ अखिलिया करते हुये ऊँचे नीचे रास्तों से गुजरते हुये कही फूल खिलाती है..कही अन्न उगाती जन जन जीवन का संचार करती हुईं मूलतापी के गौ मुख से निकलकर पूरे देश का भ्रमण करती हुईं सूर्यपूर के अरबसागर मॆ विलीन हो जाती है । ताप्ती मैया की महिमा कितनी निराली है , भक्तो ये पापों को धोकर मुक्ति दिलाती है , मृत्यु सीमा पर पड़े मनुष्य के मुँह यदि
ताप्तीजल की दो बूँद डाल दी जाये या भूलवश भी ताप्ती जल मॆ मृत देह की अस्थि प्रवाहित हो जाती है तो उस मृत  आत्मा को मुक्ति मिल जाती है ।
ताप्ती मैया सृष्टि आरम्भ से निरन्तर बहती चली आ रही है ।
ये कभी थकती है ना कभी विश्राम करती है , हम सब की झोली सुखों से भरती रहती है । ताप्ती कहाँ से आयी  , कैसे आयी और कहाँ जाती है ,इस पतित पावनी ताप्ती मैया की कथा आपको सुनाती हूँ..।

1. सूर्य देव का हुआ विवाह  ये बात है बड़ी पूरानी  ।
विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा बनी सूर्य की रानी ।
सूर्यदेव संज्ञा के संग जीवन लगे बिताने ।
यम मनु और यमुना उनकी तीन  हुई  संताने ।
संज्ञा सूर्य के तेज को सह ना सकी ज्यादा ।
सूर्यदेव को छोड़ने का उसने किया इरादा ।
सूर्यदेव की सेवा में छोडा अपनी  छाया को।
संज्ञा घोड़ी बनकर तप  करने गई मन्दिर को ।
ना उसको डर था ना थी फिकर हर  अंजाम की ।
आओ सुनाओ....

इधर सूर्यदेव भी अपने तेज से संसार को गति दे रहे थे, उनके प्रचण्ड तेज से पृथ्वी पर तापमान और गर्मी इतनी बढ़ गई कि धरती सूर्य के तेज से नष्ट हो रही है ,पृथ्वी के हिम झिलाखण्ड भी पिघलकर पीछे हट रहे थे । अत्यधिक गर्मी से पृथ्वी कि प्राण वायु पर असर पडने लगा जिसके कारण सभी जीव ब्रम्हा जी मॆ समाने लगे । सूर्य देव के तेज के कारण ब्रम्हा भी सॄष्टि कि पुन : निर्माण करने मॆ असफल रहे । तब सभी देव और माँ पृथ्वी शिव शंकर महादेव के पास जाकर प्रार्थना करने लगे । तब महादेव जी ने सभी से कहाँ..

2. छोड़ दो चिंता सारी अब तुम हो जाओ तैयार ।
सूर्यदेव की पुत्री ताप्ती अब लेंगी अवतार ।
ताप्ती मैया इस धरती का बढ़ता ताप हरेँगी ।
वो सबका कल्याण करेंगी सबके पाप हरेंगी ।
आंखों में उम्मीद लिए मन में लेकर आस ।
इतना सुन कर चले गए सब सूर्य देव के पास ।
सब देवो ने सूर्य देव के आगे सर को झुकाया ।
अब आपको रक्षा करना है सबके प्राणों की ।
आओ तुम्हे सुनाऊँ...

धरती पर बढ़ती गर्मी और तापमान को रोकने के लिये सभी देवों ने सूर्यदेव से प्रार्थना कि और धरती माँ ने कहाँ हे प्रभु अगर आपने सॄष्टि रक्षा के लिये ताप्ती माँ ध्यान नही किया तो सारी सॄष्टि का विनाश हो जायेंगा ।सबकी प्रार्थना सुनकर सूर्यदेव ने अपनी पुत्री का ताप्ती ध्यान किया -

3. सूर्य देव ने अपनी पुत्री को याद किया था  जिस दिन ।
वो आषाढ़ का महीना सप्तमी का था दिन ।
सूर्य देव के ताप से प्रकट हुई मां ताप्ती शक्तिशाली ।
उनके तेज से चारों दिशाएं हो गई उजियाली ।
प्रथम नदी के रूप में ताप्ती धरती पे  आई । ताप हरा मां ने धरती का खुशियां लौटाई ।
सूर्य ने अपने तेज से इनको प्रकट किया।
तब से ताप्ती मैया इनका नाम हुआ। लाज रख ली मैया ने सबके सम्मान की ।
आओ सुनाओ...

तब से हि ताप्ती माँ को आदिगंगा भी कहते है क्युकी वो हि सॄष्टि आरम्भ मॆ जल के रुप मॆ धरती पर आयी है । सभी नदियों उनका सेवन करती है , परन्तु उधर जब भगीरथ जी कि कठिन तपस्या से गंगा धरती पर नही आयी तब विष्णु जी ने पूछा कि हे देवी आप ब्रम्हा जी के कमन्डल से धरती पर क्यू नही जा रही हो , तो गंगा जी ने कहाँ

4. मां ताप्ती की महिमा इतनी सब उनको पुजेँगे ।
मैं जाऊंगी धरती पर मुझको नहीं पुजेँगे ।
विष्णु जी बोले नारद से तुम धरती पर जाओ ।
ताप्ती जी के पुराने सारे ग्रंथ चुरा ले आओ ।
ताप्ती ग्रंथ ना होने से उन्हें दुनिया नहीं जानेगी ।
धरती पर फिर सारी दुनिया गंगा तुम्हे नहीं मानेंगे ।
ताप्ती मां से झूठ बोलकर नारद ने ग्रंथ चुराए ।
गंगाजी तब आई धरा पर दुनिया महिमा गाए ।
तब से ही कम है धरती पर महिमा तापी नाम की ।
आओ सुनाओ तुमको...

तापी पुराण चोरी होने से माँ ताप्ती का प्रभाव तो कम नही हूआ पर लोग ताप्ती जी कि महिमा ज्यादा जान न पाये । ताप्ती माँ को नारद जी द्वारा धोके का पता चला तो उन्होने को कुष्ठ रोग का श्राप दिया और गंगा जी को अपने हि कुलवंश मॆ वधू बनकर आने का और उनकी वंश बेल ना बढ़ पाने का श्राप दिया ।श्राप से भटकने के बाद नारद मुनि ने मूलतापी आकर ताप्ती माँ कि 12 साल तपस्या की जब ताप्ती माँ प्रसन्न हुईं और उनके जल मॆ स्नान करके नारद जी श्राप मुक्त हुये । उधर गंगा मैया को भी शान्तनु से विवाह करके ताप्ती माँ की पौत्रवधू बनना स्वीकार करना पड़ा । आषाढ़ सप्तमी पर गंगा जी ताप्ती माँ के जल सेवन करती है । समुद्र मंथन से निकली मदिरा जो राक्षसों ने वरुण देव को दे दी थी और वरुण देव ने उस मदिरा का पान अगस्त मुनि के आसन पर किया जिसे देखकर अगस्त मुनि ने वरुण देव को मनुष्य योनि मॆ जन्म लेने का श्राप और पुत्र मुख देख मुक्ति का उपाय बताया । इन्ही का ताप्ती जी के साथ विवाह हूआ ।

5. वन में जब संवरण करने आये शिकार। वन में वो अपना दिल गये तब हार ।
जब तकराई ताप्ती से संवरण की नजर ।
मोहित हो गए ताप्ती को पल में देखकर ।
राजा ने फिर ताप्ती से अपनी कही कहानी ।
फिर बोले करके विवाह बन जाओ मेरी रानी ।
ताप्ती बोली मुझ को पाना है तो ऐसा करो ।
मै सूर्य पुत्री मेरे पिता को प्रसन्न करो । अदृश्य हुई ताप्ती करके बोल काम के। आओ सुनाओ सुनाओ..

इधर संवरण ताप्ती जी को पुकारते हुये बेहोश हो गये फिर जब वो होश मॆ आये तो उन्होने ने सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिये उनका तप शुरू किया । इधर सूर्यदेव ने संवरण के तप की परीक्षा ली ।एक बार रात को संवरण ध्यान मॆ मग्न थे. तब उनके कान मॆ आवाज लगाई कि हे राजन तू यहाँ किसका तप कर रहा है, उधर तेरी राजधानी आग से जल रही है , तेरा कुटुम्ब जल रहा है , तेरे नाम कि बदनामी हो रही है । परन्तु फ़िर राजा का तप नही टूटा ।संवरण कि दृढ़ता देख सूर्य नारायण प्रसन्न हुये और प्रकट होकर संवरण को वर माँगने को कहाँ फिर -

6. संवरण ने सूर्य देव को देखकर किया नमन ।
मांग रहे सूर्यदेव से वो अनमोल वचन ।
हे भगवन अपनी पुत्री को दे दो ये  आजादी ।
सात फेरे लेकर ताप्ती कर ले मुझसे  शादी ।
सूर्य देव बोले संवरण बात पता है सारी । गुरु वशिष्ठ के हाथों कराओ शादी की तैयारी ।
सबकी राजी मरजी से फिर पूरण काज हुये ।
संवरण और ताप्ती एक दूजे के हुए । फिर अपनी जिंदगानी एक दूजे के के नाम की ।
आओ सुनाओ

इसके बाद सभी देवों और ब्रम्हाणो ने संवरण और ताप्ती को आशीर्वाद दिया । शादी के कूछ अंतराल बाद ताप्ती जी ने एकपुत्र को जन्म दिया और अपने पुत्र का मुँह देखकर संवरण श्राप मुक्त हुये और अपने वरुण देव स्थान को प्राप्त हुये । ताप्ती जी ने अपने पुत्र का नाम कुरु रखा और राज बाग डोर अपने पुत्र के हवाले सौंप वो भी अपने स्थान चली गई । फिर जिस जगह ताप्ती जी के पुत्र गुरु ने तप किया था आगे चलकर वह कुरु
क्षेत्र धर्मक्षेत्र प्रसिद्ध हुआ । राजा कुरु पांडवों और कौरवों के पितामह बने । राजा जनमेजय के सर्प विनाशी यज्ञ से धर्म हानि हुईं जिसका निवारण भी ताप्ती जी चरणों पर हुआ माँ ताप्ती सर्पों के निवेदन पर उन पर विराजमान हो गई ।


ताप्ती माँ  के धाम के......4
इक्कीस कल्प के इक्कीस तीरथ सब की खास बात
इक्कीस तीरथ क्यों है जरूरी सुनो सुनाओ बात.....
दीवानों आओ मेरे साथ
भक्तो आओ मेरे साथ
1.  सूर्यलोक पहला तीरथ ताप्ती माँ जन्मी थी ।
पहली नदी के रूप में धरती पर आई थी ।
मुलतापी तीर्थ दूजा सुन लो मेरे भाई ।
ताप्ती माँ यहीं धरा पर जल के रूप में आई ।

इसी मुलतापी तीर्थ में साथ कुंड है ....
( सूर्य..शनि..ताप्ती..धर्म कुंड..पाप..नारद .नागा )

हर एक कुंड की है यहां रही है अपनी खास बात ।
दीवानों आओ मेरे साथ......
2.   शांडिल्य मुनि ने ताप्ती तट पर जप-तप खूब किया ।
इसलिए ये तीसरा तीरथ शांडिल्य तीर्थ हुआ ।
चौथा तीर्थ श्रवण तीरथ बनकर हुआ साकार ।
माता पिता संग आए थे यहां श्रवण कुमार ।
सुन लो सारे तीरथ के क्या-क्या करामात
दीवानों आओ मेरे साथ.....

3. पारसढोह तीर्थ पाँचवा  ऐसी यहां की शक्ति ।
कपिला छट गऊ दान से मिलती यहाँ मुक्ति ।
सूर्यमुखी तीरथ पर ताप्ती उलटी दिशा में बहती ।
इस तीरथ पर श्राप से मिल जाती है मुक्ति ।
कर लो बस स्नान जब आए मकर संक्रांत।
दीवानों आओ मेरे साथ....

4.सातवा तीरथ पावन है बारहलिंग शिव धाम ।
अपने पिता की श्राप मुक्ति यहां करें श्री राम ।
कान्हा ने जब देह त्यागी  क्रोधित हुए दुर्वासा ।
यहीं से स्वर्ग सिधारे जब खत्म हुई हर आशा ।
देवलोक के स्वर्ग का एक ही रस्ता देवल घाट ।
दीवानों आओ मेरे साथ

5.ब्रम्हा के आदेश पे मोहनी भंग करे एक तप ।
पूछ रही वो शिव शंकर से क्या करूं मैं अब ।
बोले भगवन ताप्ती माँ के जल में तुम समाओ ।
मोहिनी ताप्ती संगम बनकर यहां से मुक्ति पाओ।
छ :महीने यहां स्नान करें जो सिद्ध हो हर काज ।
दीवानों आओ मेरे साथ...

6. दसवा तीर्थ स्थालेेश्वर इसीलिये  कहे ।
गय्या बनके यहाँ पे यमुना ताप्ती प्रवेश करे ॥
इच्छापूरी तीरथ पे इच्छा पूरी होती सारी ।
तप करे  एक ब्राह्मण हो प्रसन्न माँ अवतारी ।
देवी ने ब्राह्मण के मन की पूरी कर दी बात ।
दीवानों आओ मेरे साथ........

7. ताप्ती पूर्णा संगम देखो बारवा तीरथ कहांए ।
यहां श्री विष्णु आदिवराह रूप में थे आए ।
सारंगखेडा तीरथ यहां इंद्र देवता आये ।
यहां से एक सुरंग से होकर वो पाताल जाएं
कर लो यहां स्नान रहता सात जनम तक  राज
दीवानों आओ मेरे साथ....

8.  चक्रतीर्थ में कृष्ण जी ने करंक दैत्य को मारा ।
इस तीरथ से होकर दैत्य स्वर्ग को सिधारा ।
प्रकाशा तीरथ पापनाशक जल इसका मतवाला ।
जो भी  करे स्नान  उसके जीवन में हो उजाला।
ब्रह्माजी यहां स्नान करें गजब इसकी बात
दीवाना आओ मेरे साथ..........

9. श्री गणेश कार्तिकेय को बाला तीरथ समझाए
ताप्ती शरण में आए कार्तिक मात- पिता को पाएँ
गौतम ऋषि की विनती से  ताप्ती मां यहाँ आई ।
रहने लगी फिर मां यही पे तीर्थ है फलदाई ।
ऐसा है तीरथ गोतमेश्वर यहां  नवाऊं माथ ।
दीवाना आओ  मेरे साथ.....

10. भैरवी तीर्थ पर इंद्र पुत्र ने श्राप से मुक्ति पाएं ।
भैरवी देवी की स्तुति उसने यहां जब गाई ।
सूर्य देव का तेज हुआ कम  होने लगे बेचैन ।
ताप्ती समुद्र संगम तीर्थ से मिला उन्हें चैन ।
ताप्ती जी के जल में नहाकर मिटा इंद्र संताप
दीवाना आओ मेरे साथ...
11. कुरुक्षेत्र मॆ  हुआ ताप्ती मां का स्वयंवर।
ताप्ती मां ने पुत्र कुरु को दिया यहां कीर्तिवर ।
ताप्ती झिरी में मां ताप्ती करती सदा ही वास ।
याद करे जो यहां पर मां को हो जाता है एहसास।
योगी संत को मछली रूप में दर्शन दिया साक्षात ।

दीवाना आओ मेरे साथ...
भक्तो आओ मेरे साथ...
इक्कीस कल्प के इक्कीस तीरथ सबकी खास बात
इक्कीस तीरथ क्यों है ज़रूरी सुनो सुनाऊँ बात



https://youtu.be/T9WvF5LOi9Q
नगरकोट महारानी रेणुका
आये शरण तुम्हारी माँ
        ...... रेणुका मैया हो

1) धामनगाँव बना अलबेला
   रोज लगे भक्तगण का मेला
   परशुराम महतारी रेणुका
    आ गये शरण तुम्हारी माँ

रेणुका मैया तोरे अंगना रे
तोरे अंगना रे भवन के भंडार रे
 रेणुका मैया हो
 नगरकोट महारानी रेणुका
आ गये शरण तुम्हारी माँ

2) अम्बादेवी धारूड वाली
   आष्टा नगर की मैया काली
  होवे जय जयकार भवानी
आ गये शरण तुम्हारी माँ

मोरी अम्बा मईया तोरे लाने रे
तोरे लाने रे लाये चुनरी भवानी गोटेदार
मोरी अम्बा मैया हो
आ गये शरण तुम्हारी माँ

3)  जल प्रवाह बनकर लहराई
   सूर्यपुत्री ताप्ती महारानी
  वेग लिये अति भारी भवानी
  आ गये शरण तुम्हारी माँ
  मोरी ताप्ती मैया बनके जल की धारा
 बनके जल की धारा मुलताई से निकली
 मोरी ताप्ती मैया हो

4) ग्राम चिचोलि की चण्डी माई
  दुवारे लाल ध्वजा लहराई
  करते जय जय कार भवानी
  आ गये शरण तुम्हारी

मोरी चन्द्रपुत्री  पूर्णा नदी माँ
पूर्णा नदी माता भैसदेही मे बनो दरबार रे
मोरी चन्द्रपुत्री माँ

  5) बारहलिंग दिखे ना दूजा
    यहाँ राम जी कर गये पूजा
    संग मे जानकी दुलारी भवानी
    आये शरण तुम्हारी माँ
    मोरे भोले बाबा तोरी महिमा से
   तेरी महिमा से परदेसी ना जाने बेनाम रे
   मोरे भोले बाबा रे

रुणुक झुणूक माँ विंध्यवासिनी, आगई मेहँदी गावं
भक्तों को तारन बैठीं माँ,नीम की थंडी छाव - 2

विन्ध्याचल की विंध्यवासिनी, मेहँदी गावं की शान हो
भक्तों को दर्शन देकर माँ, करती जग कल्याण हो
पर्वतराज का मान बढ़ाकर - 2 आई मेहँदी गावं
भक्तों को तारण बैठी माँ, नीम की थंडी छाव - 2

हुआ अवतार योग मात का, विंध्य गिरी मे छाई
पूजित हुई संसार में माता, अष्‍टभुजा कहलाई
एक दिवाने भक्त की खातिर - 2 पहुची मेहँदी गावं
भक्तों को तारण बैठी माँ, नीम की थंडी छाव-2

पावन हो गई गाव की धरती, जबसे चरण पडे माँ
दुर्गा दुर्गती दूर करो माँ, दुर्गा दास कहे माँ
कर स्विकार माँ आरती - 2 और दे आचल की छाव
भक्तों को तारण बैठीं माँ, नीम की थंडी छाव-2

रुणुक झुणूक माँ विंध्यवासिनी, आगई मेहँदी गावं
भक्तों को तारन बैठीं माँ,नीम की थंडी छाव - 2

माँ ताप्ती अवतरण की कथा

       माँ ताप्ती जन्म की कथा

प्रिय भक्तो पुण्य सलिला ताप्ती माँ जो युगों युगों और  कल्पो - कल्पो से सूर्यदेव के बाहों मॆ अखिलिया करते हुये ऊँचे नीचे रास्तों से गुजरते हुये कही फूल खिलाती है..कही अन्न उगाती जन जन जीवन का संचार करती हुईं मूलतापी के गौ मुख से निकलकर पूरे देश का भ्रमण करती हुईं सूर्यपूर के अरबसागर मॆ विलीन हो जाती है । ताप्ती मैया की महिमा कितनी निराली है , भक्तो ये पापों को धोकर मुक्ति दिलाती है , मृत्यु सीमा पर पड़े मनुष्य के मुँह यदि ताप्तीजल की दो बूँद डाल दी जाये या भूलवश भी ताप्ती  के जल मॆ मृत देह की अस्थि प्रवाहित हो जाती है तो उस मृत  आत्मा को मुक्ति मिल जाती है । ताप्ती मैया सृष्टि आरम्भ से निरन्तर बहती चली आ रही है ।
ये कभी थकती है ना कभी विश्राम करती है , हम सब की झोली सुखों से भरती रहती है । ताप्ती माता  कहाँ से आयी  , कैसे आयी , कैसे माँ ताप्ती जी का अवतरण हुआ और ताप्ती  कहाँ जाती है ,इस पतित पावनी ताप्ती मैया की कथा आपको सुनाता हूँ..
आदिकाल में भगवान शिव ने कैलाश पर्वत पर देवताओ की सभा में कार्तिकेय महाराज को ताप्ती माहात्म्य सुनाया था । उस सभा में उपस्थित रोमेश मुनि ने यह ताप्ती महात्म्य गोकर्ण मुनि से कहाँ था । रोमेश मुनि से गोकर्ण ऋषि ने ताप्ती महात्म्य सुनकर कहाँ यह बहूत उत्तम हैं ।
गोकर्ण मुनि ने द्वापर युग के अंत में रोमेश मुनि से सुना ताप्ती महात्म्य सुनकर पृथ्वी लोग के मुनियों को सुनाया । मुनियों के माध्यम से ताप्ती महात्म्य सम्पूर्ण विश्व में फैलता गया । पौराणिक हिन्दु ग्रंथो व शास्त्रों में प्रमुख स्कंदपुराण , भविष्यपुराण , सूर्यपुराण, वाराह पुराण , ब्रम्हपुराण , महाभारत , शिवपुराण, नर्मदापुराण में वर्णित ताप्ती महात्म्य को मैंने ( रविन्द्र मानकर ) संकलन किया जो आपको सुनाने का प्रयास कर रहे हैं , आशा हैं आपको यह अनमोल ताप्ती महात्म्य बहूत पसंद आएगा ।

एक बार शिव पार्वती पुत्र कार्तिकेय जी अपने हठ के कारण कैलाश छोड़कर दक्षिण चले गए । तब उन्हे माता - पिता की  अवहेलना करके अपने हठ से बड़ी ग्लानि हुई । श्री कार्तिकेय जी ने अपने अनुज गणेश जी को अपना दुख बताया , तब श्री गणेश जी ने उन्हे सम्पूर्ण तापो का निवारण करने वाली भगवती ताप्ती की शरण में जाने और वहां बेल वृक्ष के मूल में शिवार्चन  का विधान बताया ।
कार्तिकेय जी ने छः महीने वह अनुष्ठान किया और ताप्ती कृपा से उनकी ग्लानि मिट गई । परिणामस्वप शिव जी के चरणो में अनुराग उत्पन्न हुआ जिससे वे आनन्द पूर्वक कैलाश लौट आये । कैलाश के रमणीय शिखर पर भगवान शिव सुखपूर्वक शान्त मुद्रा में बैठे थे । कुमार कार्तिकेय ने कमल और पारिजात पुष्प तथा से उनकी पूजा की फिर उनके चरणो के समीप भूमि पर आसान बिछाकर बैठ गए । तब भगवान शिव ने उन्हे विकार , चिता और ग्लानि रहित देखा तो कुशल प्रश्नो के बाद उनको हृदय से लगाकर आशीष पूर्वक उनका परितोष किया ।  कार्तिकेय जी के कैलाश आते ही सभी देवी देवताओ और ऋषि मुनि भी कैलाश पर आशीर्वाद देने पहुंचे ।
तब भगवान शिव पुत्र कार्तिकेय जी के मन में सूर्यपुत्री ताप्ती जी की महिमा जानने की ईच्छा व्यक्त हुई ।   तब वे पिता शिव शंकर जी के पास गये और बोले पिताजी क्या सूर्यपुत्री ताप्ती जी का माहात्म्य नही हैं ? क्या श्री तप्तीजी नदियों मॆ प्राचीन नही हैं ?
तब शिवजी बोले - पुत्र सूर्यपुत्री ताप्ती जी कि बड़ी महिमा है, पुराने समय मॆ , जो श्री नारद जी ने कहाँ था । वह मेरे द्वारा ही कहाँ हुआ हैं । मैंने ही उन्हे बताया था कि जब गंगा ,नर्मदा ,गोमती आदि नदियाँ नही थी तब से सूर्यपुत्री ताप्ती प्रकट हुई हैं । आगे भगवान शिव कहने लगे पुत्र श्री गंगाजी में कई दिनो तक स्नान करने , नर्मदा जी के जल के दर्शन करने से और सरस्वती जी के संगम का जल पीने से जो पवित्रता होती हैं ,वही पवित्रता श्री ताप्ती के स्मरण मात्र से मनुष्य को होती हैं । यह ताप्ती आति प्राचीन हैं ।
  इतना सुनकर कार्तिकेय जी पूछा  - हे तात मैंने ताप्ती जी के दोनो किनारो आपके सुन्दर अर्चित लिंगो का दर्शन किया है प्रिय अनुज गणेश ने भी मां तापी महत्ता का गुणगान किया है , तात आप तापी जल क्यो धारण करते हो मुझे बताईये ।

तब भगवान शिव बोले- हे पुत्र  कार्तिकेय जिस तरह भगवान सुर्यदेव अपनी इच्छा से गति करते है एवं सदैव
कर्मशील रहते है । उन्हे इस ब्रम्हाण्ड की आत्मा कहा जाता है उनके बिना सृष्ठी चारो अन्धकार ही
रहेंगा । उसी तरह पृथ्वी लोग पर मां तापी के बिना जीव-जीवन सम्भव नही था । मां ताप्ती
तीनो लोको के तापो का निवारण करती है ,वो ही सृष्टी की आदिगंगा है । मां तापी मोक्ष्यदायिनी है ,जिव और
जिवन का आधार है जो भी उनके शरण मे जाता
उसके सभी तापो  को हर लेती है तापी जी ।
तब भगवान शिव आगे कहने लगे पुत्र मै तुम्हे ताप्ती माहात्म्य  सुनाता हुँ जिसके ध्यान मात्र से मनुष्य भवपार हो जाता हैं । भगवान शिव बोले -  हे पुत्र कार्तिकेय जब सूर्य नारायण का विवाह भगवान विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से हुआ । विवाह के कुछ समय पश्चात उन्हें तीन संतानो के रूप में मनु, यम और यमुना की प्राप्ति हुई इस प्रकार कुछ समय तो संज्ञा ने सूर्य के साथ निर्वाह किया परंतु संज्ञा सूर्य के तेज को अधिक समय तक सहन नहीं कर पाईं उनके लिए सूर्य का तेज सहन कर पाना मुश्किल होता जा रहा था ।
 इसी वजह से संज्ञा ने अपने पति की परिचर्चा अपनी छाया को पति सूर्य की सेवा में छोड़ कर ,वह एक घोडी का रुप धारण कर मन्दिर में तपस्या करने चली चली गईं। अपनी इच्छा से संसार को गति देने वाले हिरण्यगर्भ भगवान सुर्य भी अपने तेज से संसार को गति दे रहे थे उनके प्रचण्ड तेज के कारण सृष्टी पर महाप्रलय आया था । पृथ्वी पर गर्मी और तापमान इतना अत्यधिक बढ़ गया था ,जिससे जमीन उर्वरा शक्ति पुरी तरह खत्म हो गई थी । पृथ्वी के हिम झिलाखण्ड पिघलकरपीछे हट रहे थे ।
अत्यधिक गर्मी से सबसे अधिक पृथ्वी पर छाई प्राण वायु पर्तो पर पढ़ रहा था , जिससे सृष्टी के सभी जीव ब्रह्राजी मे विलिन होने लगे । ब्रम्ह्राजी ने पुन : सृष्टी रचना करने की कोशिश की लेकिन सुर्यदेव के प्रचण्ड तेज से वे भी व्याकुल हो गये ।
अत : ब्रम्ह्राजी ने भगवान शिव और विष्णू जी का ध्यान किया । तब भगवान शिव ने पृथ्वी मां और देवताओ से कहा कि आप चिंता ना कीजिये इस बार भगवान हिरण्य गर्भ सुर्यदेव  की पुत्री ताप्ती जन्म लेंगी जो सारे जगत के ताप हार कर जन जन का कल्याण करेंगी ।
स प्रकार शिव जी के कहने पर सभी देवता गण एवं पृथ्वी मां भगवान सुर्यदेव के पास गये और उनसे प्रार्थना की इस महाप्रलय से सृष्टी को विनाश होने से बचाये ।अत:
भगवान सुर्यदेव ने अपनी पुत्री ताप्ती का ध्यान किया ।
सुर्यपुत्री ताप्ती ताप्ती उनके ताप से उत्पन्न होकर सारी दिशाओ एवं आकाश को अलौकिक करते हुए अपने पिता का सन्ताप दूर करते भूलोक पर प्रकट हुई । इस प्रकार सृष्टी निर्माण के समय प्रथम नदी के रुप में ताप्ती जी का अवतरण हुआ। मां ताप्ती जी का जन्म आषाढ़ शुक्ल
सप्तमी को दोपहर में हुआ। सुर्यदेव ने अपने तेज
से ताप उत्पन्न करके ताप्ती जी को अवतरित किया था ,इसलिए सुर्यपुत्री का नाम तप्ती हुआ । महाभारत ,भविष्यपुराण,स्कन्धपुराण आदि अनेक पुराणो मे माँ तापी जी का उल्लेख मिलता है । 

ताप्ती संकलनकर्ता  : रविन्द्र मानकर 

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

माँ ताप्ती झिरी की कहानी

मां सुर्यपुत्री ताप्ती ने अलग-अलग स्थानो पर प्रकट होकर अपने भक्तो का ताप निवारने व उन्हे जल संकट से बचाया है ।
ऐसी ही
 ~  एक सत्य घटना पर आधारित  है मां ताप्ती की गाथा ~ 
जहाँ मां तापी अपने भक्तो के कल्याण के लिये सदा सदा के लिये बस गई ।
प्राचिन काल मे आठनेर नगर के समीप एक योगि सन्त रहते थे ।
वे प्रतिदिन ही तापी जल से स्नान करने के पश्चात मां ताप्ती जी आराधना कर देवी-देवताओ का पुंजन कर तप करने लग जाते थे ।
योगि सन्त की कुटिया से तापी नदी की दुरी लगभग 12 कि.मी थी , जिसे चलकर प्रतिदिन योगि सन्त तापी मे स्नान एवं जल लेने के लिए जाते थे । धीरे धीरे समय बितता गया और योगि सन्त कि उम्र भी काफी बढ़ चूकी थी ।
प्रात : तापी तट पर जाकर स्नान करना करना और अपने कमण्डल मे पुष्पो का जलाभिषेक देवी देवताओ के पुजन के लिए अपने कुटिया पर लेकर आना और तपस्या में लीन रहना ।
एक वक्त योगि सन्त के जीवन में ऐसा आ गया किई उन्हे चलने के लिए लाठी का सहारा लेना पढ़ा ,पर उन्होने तापी मैया के दर पर जाना नही बन्द किया ।
यही भगवान के लिये भक्त की परीक्षा होती है । उनकी इस पीड़ा को देखकर मां ताप्ती जी को उन पर दया आ गई ।
एक दिन जब योगी सन्त जैसे स्नान कर मां तापी को प्रणाम करने लगे तो मां तापी ने उन्हे प्रत्यक्ष दर्शन दिये और कहा की बेटा मैं आपकी भक्ती से प्रसन्न हुं ।
अब आपके सब संकट दुर हो जायेंगे और आपको इतनी दुर मेर तट पर स्नान एवं जल लेने के लिए नही आना पडेंगा । बेटा अब तुमसे ठीक से चलना भी नही होता फिर तुम प्रतिदिन मेरे तट पर आते रहे ।
मां ताप्ती जी ने कहा की तुम अपनी कुटिया के पास अपने तप करने वाले स्थान पर एक झिरा खोदो मै  वही आ जाऊंगी ।
मैं तुम्हे मछली रुप मे दर्शन दुंगी एवं नाक मे नथनी पहनी रहुंगी । तब मां तापी के निर्देश पर योगी बाबा ने अपने तप करने वाले स्थान पर एक झिरा खोदा जिसमे भरपुर मात्रा में जलधारा निकली और योगी सन्त को मछली रुप मे नाथ मे नथ पहने मां तापी के दर्शन हुए ओर उन्होने मां तापी को प्रणाम किया ।
योगी सन्त के मन में सन्देह हो गया इसलिए वे अगले दिन पुन : लकडी के सहारे मा तापी तट पर जा पहुचे  और स्नान कर मां को प्रणाम करने लगे कि मां ताप्ती जी प्रकट हो गई और योगि सन्त से कहने लगी कि बेटा अब क्यो इतनी दुरी पर आये हो , मैं तो स्वयं तुम्हारे द्वारा खोदे झिरे में आ चुकी हुं ।तब योगि सन्त ने कहा कि मां मै कैसे मान लू की आप वहां आ गई ।सदा के लिये वहाॅ निवास करोंगी ।
मां तापीरानी ने कहा की बेटा चिन्ता ना करो तुम्हारा ये सन्देह भी मिट जायेंगा ।
बेटा ऐसा  करो ये तूम्हारा कमण्डल और यही छोडें जाओ ।
करोडो पापो का नाश कर मोक्ष्यप्रदान करने वाली ताप्ती ने कहा मै आज से सदा सदा के लिए उस झिरी में निवास करुंगी और जो मेरे जल का पान एवं स्नान करेंगा उसको सभी तापो से मुक्ति मिल जायेंगी ।
योगि सन्त अपनी कुटिया मे वापस लौट आये और अपने तप मे लीन हो गयें ।
अगले दिन जब योगी सन्त ने देखा तो पाया कि कमण्डल एवं पुष्प जो उन्होने तापीतट पर छोड़ा था , वो उनके द्वारा खोदी झिरी के पास रखा हुआ । तब योगी सन्त को तापी जी महता का ज्ञान और उस दिन से योगि सन्त ने इस झिरी की ताप्ती झिरी नाम दिया ।
योनि सन्त अब प्रतिदिन उस झिरी के जल से स्नान कर पुष्पो का स्नान कर देवी-देवी देवताओ का पुजन करते थे ।
धीरे धीरे नगर वासियो को इस बात का पता चला तो यहां प्रतिदिन अनेक भक्तगण आने जाने लगे ।
कुछ अन्तराल के बाद योगी तपस्वी महात्मा का स्वर्गवास    हो गया ।
धीरे धीरे इस ताप्ती झिरी के प्रति लोगो की आस्था एवं विश्वास की डोर बढ़ती गई ।
आठनेर नगर की मां सुर्यपुत्री की की बेटी प्रेमा मुलिक ने सन् 1999 मे ताप्ती जी की मुर्ती की प्राण प्रतिष्ठा की गई ।
वही सन् 2001 मे मां ताप्ती जी  के भक्त भगवन्तराव जी कनाठे जी द्वारा पहली बार चतुर्मास समापन और आशाढ़ शुक्ल सप्तमी पर मां सूर्यपूत्री ताप्ती जन्मोत्सव का आयोजन किया ।
वर्ष 2005 में शहर में ऐसा जलसंकट आया जिससे सारे नगरवासी दुविधा मे पड़ गये ।
किसानो की फसले सुख रही थी ।
शहर के आसपास सभी गांवो मे माह के प्रत्येक सोमवार कामकाज बन्द रख मां तापीतट वर जाना उनका भजन किर्तन चल रहा था ।
वही शहर मे मां तापी से विनती कर नलकुप खुदाई का कार्य चल रहा था ।
मां तापी के भक्त भगवन्तराव कनाठे द्वारा तापी पुराण का पाठ अपने घर पर किया जा रहा था ।
ताप्ती झिरी मे दिन रात मां तापी से विनती कि जा रही इस जल संकट से बचाने के लिये।
आखिर मां ताप्ती जी ने भक्तो की पुकार सुन ही ली ।
अचानक बादल मण्डराये और सारा नगर पानी से जलमान हो गया ।
इससे लोगो की आस्था बढ़ती चली गई ।
नगर कुछ लोगो द्वारा यहां एक समिति गठित कि गई जो इस स्थान पर ताप्ती जन्मोत्सव का आयोजन एवं तापी झिरी की देखरेख एवं संरक्षण का कार्य करती है ।

लेखक - रविन्द्र मानकर 

माँ अम्बादेवी गुप्त गुफा यात्रा 2015

माँ अम्बा देवी गुप्त गुफा दर्शन यात्रा 2015