मंगलवार, 16 जून 2020

ताप्ती माहात्म्य हरण कथा


माँ ताप्ती महात्म्य कथा भाग -2




शिवजी बोले - पुत्र  ताप्ती जी आदिगंगा हैं  वो सृष्टि आरम्भ से इस धरा पर हैं ,सभी नदियाँ ताप्ती जी का सेवन करती हैं । कार्तिकेय बोले - सभी नदियाँ कैसे ताप्ती जी सेवन करती हैं , मुझे नदियों की इस कथा बताइये ।
भगवान  शिव भोले - पूर्वकाल मॆ गंगाजी मेरे पास  कैलाश आयी और मुझसे से बोली हे नाथ ! नारद वगैरह मुनियों को ताप्ती महात्म मिला था ,उसका प्रभाव है या नही ।
तब पुत्र मैने बताया था की  - पूर्वकाल  मॆ नारद मुनि ने बड़े कष्ट से ताप्ती महात्म प्राप्त किया था। तीनो लोको मॆ उसका प्रभाव कहने मॆ कौन समर्थ हैं ।
तब मैने ने कहाँ हे देवी गंगा आप तो ब्रम्हलोक मॆ ब्रम्हा जी के  कमण्डल मॆ रहती हो तुम्हे बड़ी तथा महापापनाशक श्री ताप्ती जी के बारे मॆ कैसे पता चला ।

गंगाजी बोली हे नाथ मै ब्रम्हलोक निवास करती हूँ और मैने ब्रम्हाजी के मुख से जो सुना और आश्चर्च देखा वह ध्यान से सुनिये..अत्यंत हर्ष के साथ हम सभी बड़ी नदियाँ ब्रम्हलोक गई थी ।
वहाँ ब्रम्हाजी ने हमारे सामने उपदेश दिया था कि जो पुरुष ताप्ती जी किनारे मृत्यु कों प्राप्त होगा और जो पुरुष ताप्ती के जल से पुष्ट होगा , ब्रम्हाजी ने कहाँ कि ताप्ती किनारे रहने वाले पुरुष यदि महापापी दुराचारी और निर्दयी हो तो भी स्वभाविक रीति से सतगति को प्राप्त होंगे ।
ऐसा ब्रम्हाजी के मुख से उपदेश सुनकर यमराज जी को बहूत दुख : हुआ और उन्होने विचार किया कि अब मै क्या करूँ !
किस प्रकार मै सभी नदियों को बुलाकर  श्री ताप्ती से प्रार्थना कर सकूंगा कि हे देवी जो श्रद्धा विहीन पापी पुरुष भी यदि सेवन करे आपके जल का तो उसे शास्वत स्थान मत देना । यमराज ने प्रार्थना कि तब ताप्ती नर्मदा आदि नदियाँ दिव्य अलंकार वाले विमान मॆ बैठकर जगत को उज्वल करने वाली नदियाँ यमपूरी मॆ आयी॥
इसके बाद मॆ विनय पूर्वक धर्मराज ने
ताप्तीजी का बड़ा महात्म देखकर सबसे पहले तप्तीजी को आसान प्रदान किया।
 ताप्तीजी का अधिक महात्म देखकर सब नदियाँ रुष्ट होकर लौटने लगी ,तो धर्मराज ने सबको प्रणाम कर कहा की नदियों यह तपती सूर्य की पुत्री हैं , सबसे प्रथम हैं , तुम इसलिये क्रोधित हो रही हो ?  यदि तुम्हे मेरे वचनों पर विश्वास नही हो तो  हो तो मार्कण्डेय मुनी से पूँछ लो !  वो हि आपकी समस्या का समाधान कर सकते है क्युकि वे सात कल्पो के बारे मे जानते है । सभी नदियाॅ लोमश मुनि के पास पहुची।
तब लोमश मुनि ने कहा की ताप्ती जी ही सबसे
प्राचिन नदी है ,तो सभी जिज्ञासावश
पुछा की हमे तापी जन्म कैसे हुआ बताये ।
तब लौमश ऋषि ने कहाँ की आप ब्रम्हाजी के पास जाये सॄष्टि के रचयिता हि आपको बता पायेंगे । सभी नदियाँ फिर ब्रम्हलोक गयी और विचित्र आसनों पर बैठने के बाद उन सब ने नम्रता पूर्वक ब्रम्हाजी से पूछा की नदियों मॆ श्रेष्ठ कौन हैं ? 
गंगा जी बोली हें नाथ !
तब ब्रम्हाजी ने कहाँ की सूर्यनारायण के शरीर से निकली ताप्ती प्रथम हैं जो की इक्कीस कल्पो का लगातार मुझे  स्मरण हैं ।
इस प्रकार कहने पर हम सभी नदियों ने गर्व छोड़कर
अपनी शंका के बारे मॆ पूछा कि किस तरह सूर्यदेव के शरीर से ताप्ती उत्पन हुयी ।
तब हमे ताप्ती जन्म के बारे मॆ पता चला ।
 हे गिरजापति महादेव अब कृपा करके  मुझे ताप्ती महात्म जानने का रास्ता बताये । 
 तब महादेव  बोले , श्री यमुना जी ताप्ती जी की बहन हैं , वह हि बता सकती हैं ताप्ती माहात्म्य और बहन होने के कारण उस पर क्रोध नही करेंगी । बाद मॆ उतावली होकर गंगाजी यमुना जी से मिलने गयी ।  इस प्रकार यमुना जी और गंगाजी मॆ मित्रता हुयी ।
कूछ समय बाद देवी गंगा ने यमुना जी को महादेव जी के पास आने का निमंत्रण दिया  जिससे ताप्ती माहात्म्य  जानने का कार्य पूर्ण हो सके ।
 देवाधि देव महादेव ने आदर पूर्वक कहाँ , हे नदियों मॆ श्रेष्ट यमुना !  तुम शीघ्र ताप्ती माहात्म्य सुनाओ  ।  तब यमुना बोली हे नाथ ताप्ती जी मेरे बहन होते हुये भी क्रोधित हुयी तो मेरी रक्षा कौन करेंगा । तब महादेव जी ने बोले हे देवी यमुना -  मै हुंकार मार कर तुम्हे बचा लूंगा , ताप्ती के श्राप के भय के कारण इस कार्य को तुम्हारे सिवाय कोई करने मॆ समर्थ नही हैं । 
यमुना जी ने काली गाय का रुप धारण किया और ताप्ती जल में ताप्ती महात्म जानने के लिये प्रवेश किया तब यमुना जी का दुष्कर्म जानकर सूर्यपुत्री ताप्ती तीव्र वेग प्रवाह से यमुना को व्याकुल कर दिया तब यमुना जी डुबकी खाती हुयी रुदन करती हुई दिखाई दी । तब  स्वयं मैं भी आश्चर्यचकित हुआ और सफेद रंग कि गाय (यमुना) को उस स्थान का ध्यान किया तब वह गाय ताप्ती जी के प्रभाव से सफेद रंग कि हो गई । ऐसा ध्यान से आभास हुआ , तब मैने हुंकार करके उस गाय कि रक्षा की । यमुना जी बार बार ताप्ती जी का ध्यान करते हुये भी ताप्ती महात्म ना पा सकी । कलांतर मॆ इस स्थान का नाम भूसावन पड़ा । ये तीर्थ प्रसिद्ध तपती पूर्णा संगम के नाम से विख्यात हुआ ।
इस तीर्थ के जल में स्नान और सेवन करने से देवी यमुना और  शिव जी क्रपा बनी रहती हैं ।  

भगवान शिव बोले - हे पुत्र जब राजा सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों के मोक्ष के लिये गंगाजी को धरती पर लाने के लिये हजारो वर्ष तक तप किया किंतु गंगाजी धरती पर ना ला सके , और तप करते करते उनकी मृत्यु हो गयीं ।
राजा सगर की मृत्यु की सूचना पाकर उनके पुत्र अंशुमान को बड़ा दुख हुआ और अंशुमान ने संकल्प लिया अब वो इस अधूरे कार्य को पूरा करेगा परंतु कठोर तप करने के बाद भी गंगाजी धरती पर नही आयी । इस तरह राजा सगर की दो पीढ़ीया समाप्त हो गयीं ।
 गंगा जी को धरती पर लाने भागीरथ ने हजारों वर्ष घोर तपस्या की थी,  उसके फलस्वरूप गंगा ने
ब्रम्ह कमण्डल (ब्रम्हलोक से) धरती पर भागीरथ के पूर्वजों का उद्धार करने आने का प्रयत्न तो किया परंतु
वसुन्धरा पर उस सदी में मात्र ताप्ती नदी की ही सर्वत्र महिमा फैली हुई थी । ताप्ती नदी का महत्व समझकर
श्री गंगा पृथ्वी लोक पर आने में संकुचित होने लगी, तदोउपरांत भगवान विष्णु स्वयं ब्रम्हलोक मे आये और माॅ गंगा जी से कहने लगे, हे देवी तपस्वी इंसान को कम-कम एक ही जन्म में वरदान दे देना चाहिये , परन्तु राजा सगर की दो पीढ़ीयाॅ समाप्त हो गयी है, और तीसरी पीढ़ी
भगीरथ के अनेक वर्ष बीत चुके है । हे  देवी कपिल मुनि आपको बुलाना चाहते है तो आपको जाना चाहिये ।
जब कपिल मुनि जैसे तपस्वी नित तुम्हारे जल मे स्नान करगें तो तुम्हारे पाप नित धुलते रहेंगे। अत : हे देवी आप मुत्यु लोक पर जाने की कृपा करे ।
गंगाजी ने भगवान विष्णु जी की बातो का उत्तर देते हुए
कहा कि भगवन ताप्तीजी मुझसे पहले धरातल पर
उपस्थित है और ताप्तीजी के तेज के सामने मेरा
प्रभाव कम हो जायेंगा । इस पर भगवान विष्णु ने कहा कि पृथ्वी लोक धरातल पर जितने भी ताप्ती पुराण है , उन्हे मृत्यु लोग से बुलाकर स्वर्ग लोक तुम्हारे सामने सामने रख देते है ।
 इस कार्य से ताप्ती जी का प्रभाव तो कम नही
होंगा। किन्तु उसके महत्व को जानेंगे ही नही तो मानेंगे
कैसे । अत: स्वमेव ही उनका ध्यान व मान कम हो जायेंगा । कपिल मुनि की कृपा से तुम्हारा मान बढ़ते
जायेंगा । इस शर्त पर गंगा जी पृथ्वी पर जाने को तैयार हुई ।

तब भगवान विष्णु ने नारद जी और गंधर्व गण की को पृथ्वी लोक पर ताप्ती जी का अदभूत महात्म चुराने भेजा । तब नारद मुनि तथा गंधर्वगणों की टोली सहित सब लोग श्री ताप्ती जी के तट पर आये और संगीत के साथ लम्बे अंतराल  तक उनकी स्तुति की । उससे प्रसन्न होकर सूर्यपुत्री ताप्ती ने नारद मुनि और गंधर्वगणों की टोली को
दर्शन दिये और कहाँ आप सब किस लिये प्रार्थना कर रहे हो ! आपको तो कूछ भी असाध्य नही हैं ।
मूझे  बहुत आश्चर्य हो रहा हैं । हे देव ऋषि वेद गायन मॆ तत्पर बड़े मुनि आप मेरे पूज्य हैं ।
यदि आप मेरे प्राण भी माँगेगे वह भी दे दूँगी । तब नारद मुनी बोले हे देवी ताप्ती जो तुम्हे प्रिय हैं ,वह आप मुझे नही दे सकती । जो आपको प्राणों से अधिक प्रिय हैं , वही माँगता हूँ ।  हे देवी सूर्यपुत्री यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं ,तो तुम्हारा महात्म मुझे दे दीजिये तो आपकी कृपा होंगी ।
नारद जी के वजन सुनकर श्री ताप्ती जी बोली - हे देव ऋषि नारद जी यह महात्म दुर्लभ हैं फ़िर भी मैं तुम्हे दूँगी । नारद जी ने कपट मन से माँगा फिर भी श्री ताप्ती जी ने अपना महात्म दे दिया ,तब नारद मुनि और गंधर्वगणों की टोली सभी ताप्ती महात्म लेकर स्वर्ग गये और देवी गंगा जी के सामने पॄथ्वी लोक के सभी ताप्ती महात्म रख दिये । तब ब्रम्हपुत्री गंगा जी पॄथ्वी लोक पर आयी और राजा भगीरथ के सौ हजार पुत्रों का उद्धार हुआ । बाद मॆ श्री सूर्यपुत्री ताप्ती जी को ज्ञात हुआ की उनका महात्म हरण गया तो श्री ताप्ती जी को क्रोध हुआ जिसके कारण ऋषि नारद को तापी पुराण चुराने की हत्या का पाप लगा और निस्तेज कुष्ठ रोग मुँह वाले हुये साथ हि सब धर्मों से बहिस्कृत हुये । श्री ताप्ती जी क्रोध मॆ अपने पिता सूर्यदेव से भी तेज हो गयी और देवऋषि नारद को कुष्ठ रोग और गंगा जी को अपने हि कुलवंश मॆ वधू बन कर आने तथा उसकी वंश बेल ना बढ़ पाने का श्राप दे गयीं । शनि भगवान की लाड़ली बहन श्री ताप्ती जी के क्रोध से देवी - देवता दानव और गंधर्व सभी डर गये ।
कही ऐसा ना हो कि उसकी क्रोधाग्नि मॆ एक बार फिर पॄथ्वी जलकर राख ना हो जाये इसलिये माँ पॄथ्वी अपना वजूद बचाने के लिये श्री ताप्ती जी के समक्ष खड़ी होकर  प्रार्थना करने लगी और कहने लगी हे देवी आपने हि मुझे सूर्यदेव के तेज से बचाया जिसके वजह से जल और जीवन सम्भव हुआ । आप हि क्रोधग्नि मॆ दहक उठेंगी तो मेरा तो वजूद हि नही रहेगा , जल जीवन दोनो समाप्त हो जायेंगा ।
 हे माँ ताप हारिणी मेरी कोख मॆ पलने वाले जीव - जन्तु आपके भाई मनु कि संतान का क्या होंगा । माँ पॄथ्वी कि प्रार्थना सुनकर सूर्यपुत्री ताप्तीजी ने अपने क्रोध  को  शांत किया ।
भगवान शिव कहने लगे हे पुत्र कार्तिकेय जब नारद मुनि कुष्ठ रोग मुख वाले ब्रम्हाजी के पास गये उस समय नारद मुनि को आते देख द्वार मॆ पर खड़े वायु देव ने आश्चर्यचकित हो तुरन्त ब्रम्हाजी के पास गये और बोले हे पितामह मुनि श्रेष्ट नारद कुष्ठ रोग वाले ब्रम्हलोक आ रहे हैं ।
तभी ब्रम्हदेव ने घ्यान किया और बोले श्री ताप्ती जी का महात्म हरण करने कि हत्या लगी हैं । मैं ऐसे अपवाद वाले पुत्र का मुख नही देख सकता हूँ । मैं समाधि मॆ जा रहा हूँ , तुम नारद मुनि से कहना कि इस समय ब्रम्हपिता के पास तुमसे मिलने का समय नही हैं । ऐसा कहकर ब्रम्हाजी बोले मेरी बनाई कृति का का नाश करने के लिये मुझसे पूछे बिना नारद ने जो किया और पाया हैं वह कोप से मनुष्य योनि पायेंगे । इस प्रकार ब्रम्हाजी समाधि मॆ बैठ गये ।
जब नारद मुनि आ गये ,तो वायुदेव ने नारद मुनि से कहाँ कि अभी ब्रम्हदेव के पास समय नही हैं । 
ऐसा सुनकर नारद मुनि ने ब्रम्हाजी के असमय समाधि जाने का विचार किया । नारद मुनि वहाँ से लौटकर मेरे पास आये पुत्र कार्तिकेय ! तुम्हारी माता पार्वती और मेरी स्तुति कि और  कहने  लगे ,  हे कैलाशनाथ  मैं दुष्ट भावना से हूँ  फिर भी आपकी शरण मॆ आया हूँ ।
 हे तीनो लोकों के स्वामी आप अंतर्यामी हो ! मुझ पर कृपा कर मुक्ति का कोई मार्ग बताये । तब मैने ध्यान द्रष्टि से सब कुछ जान लिया और मीठे वचनों मॆ कहाँ नारद तुम ताप्ती जी का पुराण हर कर लाये हो इसलिये तुम्हे कुष्ठ रोग हत्या लगी  हैं । यह किसी भी तीर्थ मॆ तप्तीजी के प्रभाव के बिना नही जायेंगी । हे नारद मैं ताप्ती जी के तेज और वेग को जानता हूँ ।
उसका कहाँ कल भविष्य को तय करेंगा । मैं स्वयं भी ताप्ती के जल का सेवन करता हूँ । अत :आप गंगाजी के साथ ताप्ती जी कि शरण मॆ जाईये । वह शरणागत पर दया करने वाली हैं । वह तुम पर जरूर प्रसन्न होंगी ।
इसके बाद नारद मुनि श्री ताप्ती उदगम मुलतापी आये और गंगाजी का स्मरण किया । नारद मुनि ने 12 वर्ष तक माँ ताप्ती जी का सेवन किया और कठोर तप किया । जिसके बाद माँ सूर्यपुत्री जी जी प्रसन्न हुई ।
माँ ताप्ती कि कृपा से कोप जल गया तभी आकाशवाणी हुई  की हे नारद मुनि आप पाप मुक्त हो गये हो ।
सूर्यपुत्री ताप्ती के तट पर जहाँ देवऋषि ने तप किया उसे नारद टेकडी के नाम से भक्तगण सुमिरन करते और जहाँ नारद मुनि प्रतिदिन ताप्ती स्नान करते थें उसे नारदकुण्ड के नाम से जाना जाता है । 
ताप्ती पुराण में उल्लेख मिलता है गल्टेश्वर शिव धाम जहाँ से कुछ दूरी माँ गंगा देवी ने ताप्ती जी कों प्रसन्न करने के लिए तपस्या की और गंगा जी नदी का रूप धारण कर ताप्ती जी में मिली जिसे सुरत वासी गल्टेश्वर महादेव के नाम से जानते है । 

संकलनकर्ता - रविन्द्र मानकर 

मंगलवार, 2 जून 2020

माँ अम्बादेवी फेसबुक लाईव प्रसारण

भारत देश हि नही विश्व के सैकड़ो देश कोरोना महामारी से परेशान हो गए , कई देशो मे सरकार को लाकडाउन लगाना पड़ा , हजारो लोग मृत्यु को प्राप्त हुए , लोग अपनी जान बचाने के घरो मे कैद हो गए उस दौरान भगवती माँ अम्बा देवी से हम सब की रक्षा की फेसबुक लाईव जागरण के माध्यम अर्जी लगाने का पुनीत कार्य कुलदेवी माँ अम्बा भवानी के भक्त रविन्द्र मानकर आरम्भ किया ...
इस फेसबुक लाईव प्रसारण मे कई भक्तों ने माँ अम्बादेवी धारूल माता के पेज से हाजरी लगाई 

भूषण कुमार गुप्ता नागपुर  , दिनेश चढ़ोकार बैतूल , संतोष जलज सिवनी , सत्येन्द्र असाटी जबलपुर , जानवी पाण्डे अयोध्या , आरती मिश्रा जबलपुर , बादल बतरा नागपुर , अर्चना पुरोहित नागपुर , गोपाल पुरोहित नागपुर , प्रीति सरगम , किशोरी कनिष्का दिल्ली , रूपेस राज इशिका हरीश भोपाल , धीरज पाण्डे जी , दीपाली यदुवंशी इटारसी , मनीष अग्रवाल जी जबलपुर  , हेमेश राज सपना राज जबलपुर , वैष्णवी राय भोपाल, पिंकी बाथम भोपाल , कृष्णा नागवंशी छिंदवाड़ा , रजनी पटेल जबलपुर  , विपिन चौबे भोपाल , मोहित यादव जबलपुर , कल्पना सेन जबलपुर , सोनम मिश्रा  जबलपुर , लकी सोनी जबलपुर , प्रियंका भास्कर जबलपुर , नीलम जी मथुरा , किशोर साहू प्रज्ञा साहू , प्रिया गुप्ता भोपाल , शिवा विश्वकर्मा जबलपुर , कविता विश्वकर्मा जबलपुर , आशीष प्रजापति जबलपुर , अम्बे गुप्ता शहडोल , सोहीत गर्ग जबलपुर , सुनील कुमार पटेल कटनी , पण्डित शरद तिवारी जबलपुर , सविता मिश्रा जबलपुर , मनोहर जोशी जबलपुर , सत्यम शर्मा केवल शर्मा , इंदु मिश्रा जी जबलपुर , हिना ठाकुर जबलपुर , संतोष मिश्रा जी जबलपुर , कौशिक दास कोलकाता , मास्टर कृष्णा तिवारी जबलपुर , पदमा साहू होशंगाबाद , मेहक बंसल गाजियाबाद , रेखा ठाकुर जबलपुर , वंदना साहू जबलपुर , संगीता बुंदेला जबलपुर , विकास आहके बैतूल , पूनम सेन जबलपुर , पण्डित विकास शर्मा , हिमांशु राज दिल्ली , कविता सिन्हा जबलपुर , पूजा छाबड़ा प्रयागराज , रिंकी मर्सकोले आदि 
















































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भजन गायिका दीपाली यादव (इटारसी ) से ..
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धर्म प्रचार प्रसार मंच प्रमुख (रविन्द्र मानकर -980628417 )

सोमवार, 18 मई 2020

अम्बा माँ की प्यारी मैना भक्त की कहानी


भक्तों तुमने तो अनेक पावन कथा सुनी होगी । माँ तारा कें भक्त वामा खेपा की ,  कलकत्ते वाली काली माँ कें भक्त रामकृष्ण परमहंस की , माँ वैष्णो देवी कें भक्त श्रीधर पण्डित  की , माँ ग्वाला देवी कें भक्त ध्यानु की , मैहर की माँ शारदा माता कें भक्त आल्हा की , पर जो आज पावन कथा हम आपको सुनाने जा रहें है ,  वह सबसे भिन्न है, अनुपम है।

अम्बा देवी की प्यारी भक्त मंगला माता की कथा बड़ी मनोरम है।  माँ अम्बादेवी क्षेत्र तपस्वी सन्त माँ मंगला देवी की तपो भूमि कें नाम से जाना जाता है । अम्बादेवी क्षेत्र ऋषि मुनियों की पावन भूमि रही है । अम्बा देवी क्षेत्र कों पूर्व में विधर्भ कें नाम से जाना जाता था । यही वो पावन भूमि है जहाँ भगवान शिव ने कुछ पल विश्राम किया । यही वो पुण्य क्षेत्र है जहाँ त्रेतायुग में श्री राम जी ने माता जानकी और लक्ष्मण कें साथ कुछ समय व्यतीत किया था । यही वो मोक्ष भूमि है जहाँ पाण्डवों ने अज्ञात वास गुजारा और अर्जुन ने अम्बिकेश्वर तीर्थ की स्थापना की थी ।
तपस्वी सन्त मंगला देवी एक अवदूत का ही रूप थी ।
अवदूत अर्थात परमेश्वर कें भेजे हुए दूत अर्थात वो आत्माएं जो मुक्त होती है , इस भू लोक की तमाम औपचारिकताओं से , छल , कपट जैसे तमाम भौतिक बंधनो से , ये होती है समय कें कालचक्र से परे , माया कें जटिल बंधनो से दूर , ब्रम्हानंद की स्थति में अवदूत इस दुनियाँ में आते है , आत्मज्ञान का प्रकाश फैलाने , भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने अवदूत रूप धरते है ताकि हर कोई अपना मन परमपिता परमेश्वर में लगा सकें । इस तरह निर्माण प्राप्त कर सकें ।

आओ हम अम्बा देवी माँ का,सुमिरन कर लें
अदिशक्ति शेरांवाली का तो हम, भजन कर लें ।।
माँ की प्यारी भक्त राधा का,
उनके चरणों मे हम नमन कर लें ।।
आओ हम अम्बा देवी माँ का......

कहते है की माँ मंगला का जन्म परतवाडा महाराष्ट्र कें एक निर्धन परिवार में हुआ था ।
मंगला माता कें माता पिता पोत - माला गांव - गांव कें बाजार जा कर बेचा करते थें । मणिहार बेचने तथा पोत माला बेचने से जो कूछ भी मिल जाता था मंगला कें माता पिता उसी से अपना जीवन निर्वाह करते थें ।
माता पिता ने मंगला का विवाह करना चाहा लेकिन मंगला माता गृहस्थ जीवन नही जीना चाहती थी ,वो तो तपस्विनी थी , वो आदि शक्ति का अवतार थी , उनको भला कौन रोक सकता था , इसलिए शादी में मंडप से बारात और दुल्हे कों वापस जाना पड़ा ।
इसके कुछ समय बाद मंगला कें माता - पिता का स्वर्गवास हो गया । जिसके कारण मंगला माँ पर घर की पूरी जिम्मेदारी आ गई । अपनी आजीवका चलाने कें लिए मंगला ने भी मणिहारी बेचने का छोटा व्यवसाय चालू किया ।
मंगला कों जीवन में अनेक कठिनाईयो का सामना करना पड़ा , जीवन में कई उतार चढ़ाव आते रहे और वे अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रही । इस दौरान उनकी मुलाकात एक ऐसे सन्त सूरदास महाराज से हुई जो बड़े तेजस्वी और सिद्धि प्राप्त गुरू थें ।
सूरदास महाराज ने मंगला माता कों अपनी बेटी मानकर गुरू  दीक्षा दी । सन्त शिरोमणि सूरदास महाराज ने मंगला माता  कों रद्दो नाम दिया । इसी कारण लोग उन्हे राधा कहकर भी पुकारते थें ।
 कहते है की मंगला माता कभी भैंसदेही कें बाजार में नजर आती , तो कभी अचलपूर कें बाजार में दिखाई देती , तो कभी चाण्दूबार की गलियों में नजर आती , तो कभी आठनेर कें गावों में भ्रमण करती दिखाई देती। मंगला माता बड़ी करुणामय और दयालु थी । उनके भक्त उन्हे जहाँ भी याद करते वो वहां उपस्थित हो जाती थी ।
जब मंगला माता आठनेर बाजार करने जाती तो सावंगी गांव में अपनी सखी राधा बाई कें घर एक दों दिन रहकर आगे का बाजार करने निकलती थी । मंगला माता ने अपनी सखी राधा बाई कें साथ नागद्वार की यात्रा भी की थी ।
कूछ दिन तक ऐसा हि चलते रहा । इसके बाद मंगला माँ ने सोचा की इस जीवन में क्या रखा है । मेरे आगे पीछे कौन है , मैं किसके लिए ये धन एकत्रित करू ।
एक दिन मंगला माता ने सूरदास महाराज से मुलाकात की । उन्होने अपने गुरूदेव से कहाँ की , मैं क्या करू गुरुदेव जिससे मेरा कल्याण हो सकें । मेरा ये जीवन सफल हो सकें । तब सूरदास महाराज ने कहाँ की बेटी तेरे मन में जो ईच्छा है वह बता । तब मंगला माँ ने कहाँ की मैं सालबर्डी कें आत्मज्ञानी सन्त महादेव बाबा की सेवा करना चाहती हु । सूरदास महाराज बोले की ठीक है बेटी , अगर तु सन्तो की सेवा करना चाहती है तो मुझे तेरा नाम रद्दो बदलना होगा । आज से तुम्हारा नाम चन्दा होगा । अब मंगला माता महादेव बाबा और मारोती बाबा कें तपोभूमि शिवधाम सालबर्डी आ गई । मंगला माता सन्तो की सेवा करने लगी । महादेव बाबा ने मंगला देवी की कई परीक्षाए ली और सारी परीक्षाओं में मंगला माता सफल हुई ।
सन्तो की कृपा और आशीर्वाद से मंगला कों शिव बाबा अर्थात सालबर्डी महादेव भी प्रसन्न हो गए । मंगला माता महादेव बाबा की सेवा कें साथ हि शिव भगवान की भी सेवा भक्ति करती रही   । सन्तो की कृपा से मंगला माता कों आत्मज्ञान की प्राप्ति होने लगी थी । महादेव बाबा ने निर्णय किया की अब मंगला कों भी एक दरबार देना चाहिए । महादेव बाबा ने मंगला माता कों अपने पास बुलाया और कहाँ बेटी अब यहां का तुम्हारा सम्पूर्ण कार्य पूर्ण हो गया । अपने धाम जाकर आदिशक्ति की महिमा कों जन जन तक पहुंचाओ । यहां से 10 कोश की दूरी पर माँ अम्बाजी का गुप्त परम धाम विराजमान है जहाँ माँ सती का हृदय गिरा था , वही तुम्हारी माता अम्बा , पिता भोलानाथ रहते है । तुम उस धाम की खोज करो , देवी अम्बा की साधना कर माता कों प्रसन्न करो ।
कहते है की महादेव बाबा से ऐसी बात सुनकर मंगला रोने लगी , कहने लगी की मैं नही जाऊंगी यहां से कही भी । मैं आपकी सेवा करूंगी । यहां भी मेरे पिता शिव शंकर रहते है मैं उन्ही कें सहारे रहूंगी ।
तब महादेव बाबा ने मंगला कों समझाया और कहाँ बेटी यहां पर हम सब कें पिता देवाधिदेव महादेव का धाम है , यहां भक्त उनके नाम से आते है लेकिन आप जिस धाम में जा रही हो वहां माँ शेरावाली अम्बादेवी कें नाम से भक्त गण आएगे । ये दोनो हि धाम भविष्य में बड़े जनकल्याण का कार्य करेंगे । इस तरह महादेव बाबा और मारोती कें कहने और प्रभातपट्टन कें भक्तों ने दबाव डाला की माता तुम्हे इस धाम कों छोड़कर जाना होगा ।
सन्तो और भक्तों कें बार बार निवेदन पर मंगला माता अपने धाम की खोज करने कें लिए तैयार हो गई ।
महादेव बाबा और मारोती बाबा ने कहाँ की बेटी जैसा हमारा धाम चल रहा है भोलानाथ बाबा की कृपा से वैसा हि तुम्हारा धाम माँ अम्बादेवी कृपा से चलेगा । सन्तो ने कहाँ की बेटी हम तुम्हारा नाम चन्दा से बदलकर मंगला रख रहे है अब तुम्हे भक्तगण इसी नाम से जानेंगे ।
जाते वक्त मंगला देवी ने दोनो सन्तो कों कहाँ की आप बाबा महाज्ञानी हो , आप योगी हो  , मैं वहां कैसे पहुंचूंगी , कैसे अकेली रह पाऊँगी , कैसे माँ अम्बा की तपस्या कर पाऊँगी ,
मैं सब आप पर छोड़ देती हूँ ।
तब महादेव बाबा बोले - बेटी तुम्हे काली बिल्ली रास्ता दिखाते जाएगी वो जा रूक जाएगी वही तुम्हारा धाम होगा । मंगला माता काली बिल्ली कें पीछे पीछे चलते हुए जाती थी,  जहाँ वह एक गुफा कें अन्दर गई वही मंगला माता ने अपना ढेरा डाल लिया ।
सन 1971 में माँ मंगला देवी धारूल गांव से दों कि.मी दूर सतपुड़ा कें घने जंगल कि एक गुफा में बैठकर तपस्या करने लगी ।
कहते है की तीन वर्ष तक माँ मंगला ने भगवती अम्बा का कठोर जप किया और पाला पत्ते, फल फूल खा कर अम्बे माँ  का ध्यान करती रही ।
इसी बीच मंगला माता की एक सखी राधा बाई कों स्वप्न में माता पार्वती और शिवजी ने दर्शन दिये और अम्बादेवी की गुप्त गुफा कें दर्शन कराये । भगवान शिव और माता पार्वती ने राधा से कहाँ की बेटी मैं यहां आदिकाल से विराजमान हूँ । प्राचिन गुफा धाम कें सामने तुम्हारी सखी मंगला बैठी हुई है तुम उसे सहयोग करो ।
सावंगी गांव की राधा बाई स्वप्न में माता कें बताए स्थान पर मंगला से मिलने पहुंची ।
दोनो हि सखियो की माँ अम्बे पर अटूट श्रध्दा और आस्था थी । उनको कई वर्ष बीत गए थें मिले हुए । राधा ने स्वप्न कें बारे में मंगला देवी कों बताया । दोनो सखियों ने माँ अम्बा कें इस तीर्थ कों जन जन पहुचाने कें लिए कार्य योजना बनाई । राधा कें गांव से अम्बादेवी गुफा की दूरी 60 कि.मी थी ।
हर सप्ताह कें अन्त में राधा  गांव कें भक्तों कें साथ मंगला देवी से मिलने आती थी , मंगला माता कें वस्त्र और खाने कें लिये भी कच्चा पक्का अन्न लें आती थी ।
उस दौरान आठनेर क्षेत्र कें ग्वाल किसानों कें पशु चराने कें लिए जंगल आते थें और अम्बा माई कि गुफा पर हि अपना ढेरा डाला करते थें ।
इन ग्वालों ने अम्बा देवी की गुफा और वहां रहने वाली तपस्वी की सूचना गांव गांव पहुचाई ।
राधा बाई जब भी अम्बा माई जाती तो वह अपने साथ अपने सावंगी गांव कें कई भक्तों कों लेकर आती थी । माँ मंगला और राधा बाई में सगी बहनो से भी बढ़कर प्रेम था ।
एक बार की बात है राधा बाई गाँव के हि अम्बा भक्त नामदेव माकोडे , देवराव राणे अपने छोटे पुत्र गनपत के साथ अम्बा यात्रा को निकली ।  जब राधा बाई अम्बा माई पहुँची तो मंगला देवी को बहुत ही प्रसन्नता हुईं ।
राधाबाई अपनी सखी मंगला को हमेशा ही पहनने के लिये वस्त्रों के रुप ब्लाउस और लहंगा भेंट करती थी और उसके भोजन के लिये कूछ हल्का पुलका ले आती थी ।
अब माँ अम्बा कें धाम में भक्तो के कल्याण के लिये गंगा का रहना जरूरी था पर गुफा से  दुर दुर तक पानी कही नही मिल पाता था । राधाबाई और मंगला  माता ने माँ ताप्ती माई का स्मरण करते हुये भक्तगण नामदेव और देवराव कें साथ एक झीरी (गड्डा) खोदने लगे । माँ अम्बा भवानी की कृपा से खोदते हुये लम्बे अंतराल कें बाद जलधारा के रुप में आदि  गंगा ताप्ती मैया का उदगम हो गया ।
माँ अम्बे धाम में ताप्ती रानी के आगमन से सारे तीर्थ धाम आ गये सभी भक्त जनों कें चेहरे पर प्रसन्नता की लहर नजर आ रही थी ।
माँ मंगला की वर्षों की तपस्या से माँ भगवती दुर्गा प्रसन्न हुई और माता की कृपा से मंगला कों सिद्धि प्राप्त हो गई ।
अम्बादेवी गुफा के प्रवेश द्वार के पास एक बड़े नागराज रहते है , मंगला माता ने उनसे गुफा कें प्रवेश द्वार से हटने कें लिए अनुरोध किया । मंगला माता की आज्ञा से जब नागदेवता वहां से हट गए तब माता ने शिव दरबार की स्थापना की और नागदेव महाराज से वचन मांगा की आप सच्चे भक्तों कों दर्शन दोगे और आपके धाम में ही रहोगे ।
 स्वयं भू प्रकट हुई अम्बा देवी माँ की गुफा में माँ काली , माँ अन्नपूर्णा , माँ कामाख्या , भगवान शिव , माँ ताप्ती , नागदेवता , माँ रेणुका , माँ शेरावाली , श्री हनुमान जी आदि देवी - देवताओ कें धामों की स्थापना स्वयं तपस्वी मंगला माता ने ही की ।
मंगला ने अपनी दिव्य दृष्टि से वो प्राचिन गुप्त गुफा देखी जहाँ स्वयं माता पार्वती और भगवान शिव निवास करते  है , जहाँ माँ सती का हृदय गिरा हुआ है । अपनी सखी राधा बाई कें साथ प्रथम बार मंगला ने उस दिव्य गुफा की यात्रा की ।

शनिवार, 9 मई 2020

माँ मंगला की कहानी



भक्तों तुमने तो अनेक पावन कथा सुनी होगी । माँ तारा कें भक्त वामा खेपा की ,  कलकत्ते वाली काली माँ कें भक्त रामकृष्ण परमहंस की , माँ वैष्णो देवी कें भक्त श्रीधर पण्डित  की , माँ ग्वाला देवी कें भक्त ध्यानु की , मैहर की माँ शारदा माता कें भक्त आल्हा की , पर जो आज पावन कथा हम आपको सुनाने जा रहें है ,  वह सबसे भिन्न है, अनुपम है।

अम्बा देवी की प्यारी भक्त मंगला माता की कथा बड़ी मनोरम है।  माँ अम्बादेवी क्षेत्र तपस्वी सन्त माँ मंगला देवी की तपो भूमि कें नाम से जाना जाता है । अम्बादेवी क्षेत्र ऋषि मुनियों की पावन भूमि रही है । अम्बा देवी क्षेत्र कों पूर्व में विधर्भ कें नाम से जाना जाता था । यही वो पावन भूमि है जहाँ भगवान शिव ने कुछ पल विश्राम किया । यही वो पुण्य क्षेत्र है जहाँ त्रेतायुग में श्री राम जी ने माता जानकी और लक्ष्मण कें साथ कुछ समय व्यतीत किया था । यही वो मोक्ष भूमि है जहाँ पाण्डवों ने अज्ञात वास गुजारा और अर्जुन ने अम्बिकेश्वर तीर्थ की स्थापना की थी ।
तपस्वी सन्त मंगला देवी एक अवदूत का ही रूप थी ।
अवदूत अर्थात परमेश्वर कें भेजे हुए दूत अर्थात वो आत्माएं जो मुक्त होती है , इस भू लोक की तमाम औपचारिकताओं से , छल , कपट जैसे तमाम भौतिक बंधनो से , ये होती है समय कें कालचक्र से परे , माया कें जटिल बंधनो से दूर , ब्रम्हानंद की स्थति में अवदूत इस दुनियाँ में आते है , आत्मज्ञान का प्रकाश फैलाने , भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने अवदूत रूप धरते है ताकि हर कोई अपना मन परमपिता परमेश्वर में लगा सकें । इस तरह निर्माण प्राप्त कर सकें ।

आओ हम अम्बा देवी माँ का,सुमिरन कर लें
अदिशक्ति शेरांवाली का तो हम, भजन कर लें ।।
माँ की प्यारी भक्त राधा का,
उनके चरणों मे हम नमन कर लें ।।
आओ हम अम्बा देवी माँ का......


कहते है की माँ मंगला का जन्म परतवाडा महाराष्ट्र कें एक निर्धन परिवार में हुआ था ।
मंगला माता कें माता पिता पोत - माला गांव - गांव कें बाजार जा कर बेचा करते थें । मणिहार बेचने तथा पोत माला बेचने से जो कूछ भी मिल जाता था मंगला कें माता पिता उसी से अपना जीवन निर्वाह करते थें ।
माता पिता ने मंगला का विवाह करना चाहा लेकिन मंगला माता गृहस्थ जीवन नही जीना चाहती थी ,वो तो तपस्विनी थी , वो आदि शक्ति का अवतार थी , उनको भला कौन रोक सकता था , इसलिए शादी में मंडप से बारात और दुल्हे कों वापस जाना पड़ा ।
इसके कुछ समय बाद मंगला कें माता - पिता का स्वर्गवास हो गया । जिसके कारण मंगला माँ पर घर की पूरी जिम्मेदारी आ गई । अपनी आजीवका चलाने कें लिए मंगला ने भी मणिहारी बेचने का छोटा व्यवसाय चालू किया ।
मंगला कों जीवन में अनेक कठिनाईयो का सामना करना पड़ा , जीवन में कई उतार चढ़ाव आते रहे और वे अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रही । इस दौरान उनकी मुलाकात एक ऐसे सन्त सूरदास महाराज से हुई जो बड़े तेजस्वी और सिद्धि प्राप्त गुरू थें ।
सूरदास महाराज ने मंगला माता कों अपनी बेटी मानकर गुरू  दीक्षा दी । सन्त शिरोमणि सूरदास महाराज ने मंगला माता  कों रद्दो नाम दिया । इसी कारण लोग उन्हे राधा कहकर भी पुकारते थें ।
 कहते है की मंगला माता कभी भैंसदेही कें बाजार में नजर आती , तो कभी अचलपूर कें बाजार में दिखाई देती , तो कभी चाण्दूबार की गलियों में नजर आती , तो कभी आठनेर कें गावों में भ्रमण करती दिखाई देती। मंगला माता बड़ी करुणामय और दयालु थी । उनके भक्त उन्हे जहाँ भी याद करते वो वहां उपस्थित हो जाती थी ।
जब मंगला माता आठनेर बाजार करने जाती तो सावंगी गांव में अपनी सखी राधा बाई कें घर एक दों दिन रहकर आगे का बाजार करने निकलती थी । मंगला माता ने अपनी सखी राधा बाई कें साथ नागद्वार की यात्रा भी की थी ।
कूछ दिन तक ऐसा हि चलते रहा । इसके बाद मंगला माँ ने सोचा की इस जीवन में क्या रखा है । मेरे आगे पीछे कौन है , मैं किसके लिए ये धन एकत्रित करू ।
एक दिन मंगला माता ने सूरदास महाराज से मुलाकात की । उन्होने अपने गुरूदेव से कहाँ की , मैं क्या करू गुरुदेव जिससे मेरा कल्याण हो सकें । मेरा ये जीवन सफल हो सकें । तब सूरदास महाराज ने कहाँ की बेटी तेरे मन में जो ईच्छा है वह बता । तब मंगला माँ ने कहाँ की मैं सालबर्डी कें आत्मज्ञानी सन्त महादेव बाबा की सेवा करना चाहती हु । सूरदास महाराज बोले की ठीक है बेटी , अगर तु सन्तो की सेवा करना चाहती है तो मुझे तेरा नाम रद्दो बदलना होगा । आज से तुम्हारा नाम चन्दा होगा । अब मंगला माता महादेव बाबा और मारोती बाबा कें तपोभूमि शिवधाम सालबर्डी आ गई । मंगला माता सन्तो की सेवा करने लगी । महादेव बाबा ने मंगला देवी की कई परीक्षाए ली और सारी परीक्षाओं में मंगला माता सफल हुई ।
सन्तो की कृपा और आशीर्वाद से मंगला कों शिव बाबा अर्थात सालबर्डी महादेव भी प्रसन्न हो गए । मंगला माता महादेव बाबा की सेवा कें साथ हि शिव भगवान की भी सेवा भक्ति करती रही   । सन्तो की कृपा से मंगला माता कों आत्मज्ञान की प्राप्ति होने लगी थी । महादेव बाबा ने निर्णय किया की अब मंगला कों भी एक दरबार देना चाहिए । महादेव बाबा ने मंगला माता कों अपने पास बुलाया और कहाँ बेटी अब यहां का तुम्हारा सम्पूर्ण कार्य पूर्ण हो गया । अपने धाम जाकर आदिशक्ति की महिमा कों जन जन तक पहुंचाओ । यहां से 10 कोश की दूरी पर माँ अम्बाजी का गुप्त परम धाम विराजमान है जहाँ माँ सती का हृदय गिरा था , वही तुम्हारी माता अम्बा , पिता भोलानाथ रहते है । तुम उस धाम की खोज करो , देवी अम्बा की साधना कर माता कों प्रसन्न करो ।
कहते है की महादेव बाबा से ऐसी बात सुनकर मंगला रोने लगी , कहने लगी की मैं नही जाऊंगी यहां से कही भी । मैं आपकी सेवा करूंगी । यहां भी मेरे पिता शिव शंकर रहते है मैं उन्ही कें सहारे रहूंगी ।
तब महादेव बाबा ने मंगला कों समझाया और कहाँ बेटी यहां पर हम सब कें पिता देवाधिदेव महादेव का धाम है , यहां भक्त उनके नाम से आते है लेकिन आप जिस धाम में जा रही हो वहां माँ शेरावाली अम्बादेवी कें नाम से भक्त गण आएगे । ये दोनो हि धाम भविष्य में बड़े जनकल्याण का कार्य करेंगे । इस तरह महादेव बाबा और मारोती कें कहने और प्रभातपट्टन कें भक्तों ने दबाव डाला की माता तुम्हे इस धाम कों छोड़कर जाना होगा ।
सन्तो और भक्तों कें बार बार निवेदन पर मंगला माता अपने धाम की खोज करने कें लिए तैयार हो गई ।
महादेव बाबा और मारोती बाबा ने कहाँ की बेटी जैसा हमारा धाम चल रहा है भोलानाथ बाबा की कृपा से वैसा हि तुम्हारा धाम माँ अम्बादेवी कृपा से चलेगा । सन्तो ने कहाँ की बेटी हम तुम्हारा नाम चन्दा से बदलकर मंगला रख रहे है अब तुम्हे भक्तगण इसी नाम से जानेंगे ।
जाते वक्त मंगला देवी ने दोनो सन्तो कों कहाँ की आप बाबा महाज्ञानी हो , आप योगी हो  , मैं वहां कैसे पहुंचूंगी , कैसे अकेली रह पाऊँगी , कैसे माँ अम्बा की तपस्या कर पाऊँगी ,
मैं सब आप पर छोड़ देती हूँ ।
तब महादेव बाबा बोले - बेटी तुम्हे काली बिल्ली रास्ता दिखाते जाएगी वो जा रूक जाएगी वही तुम्हारा धाम होगा । मंगला माता काली बिल्ली कें पीछे पीछे चलते हुए जाती थी,  जहाँ वह एक गुफा कें अन्दर गई वही मंगला माता ने अपना ढेरा डाल लिया ।
सन 1971 में माँ मंगला देवी धारूल गांव से दों कि.मी दूर सतपुड़ा कें घने जंगल कि एक गुफा में बैठकर तपस्या करने लगी ।
कहते है की तीन वर्ष तक माँ मंगला ने भगवती अम्बा का कठोर जप किया और पाला पत्ते, फल फूल खा कर अम्बे माँ  का ध्यान करती रही ।
इसी बीच मंगला माता की एक सखी राधा बाई कों स्वप्न में माता पार्वती और शिवजी ने दर्शन दिये और अम्बादेवी की गुप्त गुफा कें दर्शन कराये । भगवान शिव और माता पार्वती ने राधा से कहाँ की बेटी मैं यहां आदिकाल से विराजमान हूँ । प्राचिन गुफा धाम कें सामने तुम्हारी सखी मंगला बैठी हुई है तुम उसे सहयोग करो ।
सावंगी गांव की राधा बाई स्वप्न में माता कें बताए स्थान पर मंगला से मिलने पहुंची ।
दोनो हि सखियो की माँ अम्बे पर अटूट श्रध्दा और आस्था थी । उनको कई वर्ष बीत गए थें मिले हुए । राधा ने स्वप्न कें बारे में मंगला देवी कों बताया । दोनो सखियों ने माँ अम्बा कें इस तीर्थ कों जन जन पहुचाने कें लिए कार्य योजना बनाई । राधा कें गांव से अम्बादेवी गुफा की दूरी 60 कि.मी थी ।
हर सप्ताह कें अन्त में राधा  गांव कें भक्तों कें साथ मंगला देवी से मिलने आती थी , मंगला माता कें वस्त्र और खाने कें लिये भी कच्चा पक्का अन्न लें आती थी ।
उस दौरान आठनेर क्षेत्र कें ग्वाल किसानों कें पशु चराने कें लिए जंगल आते थें और अम्बा माई कि गुफा पर हि अपना ढेरा डाला करते थें ।
इन ग्वालों ने अम्बा देवी की गुफा और वहां रहने वाली तपस्वी की सूचना गांव गांव पहुचाई ।
राधा बाई जब भी अम्बा माई जाती तो वह अपने साथ अपने सावंगी गांव कें कई भक्तों कों लेकर आती थी । माँ मंगला और राधा बाई में सगी बहनो से भी बढ़कर प्रेम था ।
एक बार की बात है राधा बाई गाँव के हि अम्बा भक्त नामदेव माकोडे , देवराव राणे अपने छोटे पुत्र गनपत के साथ अम्बा यात्रा को निकली ।  जब राधा बाई अम्बा माई पहुँची तो मंगला देवी को बहुत ही प्रसन्नता हुईं ।
राधाबाई अपनी सखी मंगला को हमेशा ही पहनने के लिये वस्त्रों के रुप ब्लाउस और लहंगा भेंट करती थी और उसके भोजन के लिये कूछ हल्का पुलका ले आती थी ।
अब माँ अम्बा कें धाम में भक्तो के कल्याण के लिये गंगा का रहना जरूरी था पर गुफा से  दुर दुर तक पानी कही नही मिल पाता था । राधाबाई और मंगला  माता ने माँ ताप्ती माई का स्मरण करते हुये भक्तगण नामदेव और देवराव कें साथ एक झीरी (गड्डा) खोदने लगे । माँ अम्बा भवानी की कृपा से खोदते हुये लम्बे अंतराल कें बाद जलधारा के रुप में आदि  गंगा ताप्ती मैया का उदगम हो गया ।
माँ अम्बे धाम में ताप्ती रानी के आगमन से सारे तीर्थ धाम आ गये सभी भक्त जनों कें चेहरे पर प्रसन्नता की लहर नजर आ रही थी ।
माँ मंगला की वर्षों की तपस्या से माँ भगवती दुर्गा प्रसन्न हुई और माता की कृपा से मंगला कों सिद्धि प्राप्त हो गई ।
अम्बादेवी गुफा के प्रवेश द्वार के पास एक बड़े नागराज रहते है , मंगला माता ने उनसे गुफा कें प्रवेश द्वार से हटने कें लिए अनुरोध किया । मंगला माता की आज्ञा से जब नागदेवता वहां से हट गए तब माता ने शिव दरबार की स्थापना की और नागदेव महाराज से वचन मांगा की आप सच्चे भक्तों कों दर्शन दोगे और आपके धाम में ही रहोगे ।
 स्वयं भू प्रकट हुई अम्बा देवी माँ की गुफा में माँ काली , माँ अन्नपूर्णा , माँ कामाख्या , भगवान शिव , माँ ताप्ती , नागदेवता , माँ रेणुका , माँ शेरावाली , श्री हनुमान जी आदि देवी - देवताओ कें धामों की स्थापना स्वयं तपस्वी मंगला माता ने ही की ।
मंगला ने अपनी दिव्य दृष्टि से वो प्राचिन गुप्त गुफा देखी जहाँ स्वयं माता पार्वती और भगवान शिव निवास करते  है , जहाँ माँ सती का हृदय गिरा हुआ है । अपनी सखी राधा बाई कें साथ प्रथम बार मंगला ने उस दिव्य गुफा की यात्रा की ।
   
जो भी श्रध्दालु माँ अम्बादेवी धाम आते वो स्वयं भू प्रकट हुई माँ आदि शक्ति कों नमन करते और मंगला माता से कुछ न कुछ लेकर जाते थें ।
माँ अम्बा की प्यारी भक्त मंगला कें तपोबल से दरबार आने वाले हर सच्चे भक्त की मनोकामना पूरी होने लगी ।
अनेक भक्तों कों उनकी अपेक्षा कें अनुसार लाभ होने लगा।
भक्तों कों उन्होने अनेक कष्टो से बचाया । मृत्यु सैया पर लेते भक्तों कों भी बचाया , किसी की विकलांगता दूर की , तो किसी कों दृष्टि दी ।
 माँ अम्बा की कृपा से किसी कों पुत्र प्राप्ति हुई , तो किसी कों धन सम्पति मिली , किसी कों रोजगार मिला तो किसी कों तंत्र बांधा से मुक्ति मिली ।  आज भी अनेक प्रांतो में अम्बा देवी की प्यारी भक्त मंगला माता का परिवार रहता है । पूर्णरूप से समर्पित माँ अम्बा भक्त सुभाजी घोड़की , केशों पटेल , राधा बाई , अम्बा बाई ये माता भक्तों का परिवार माना जाता है ।
माँ अम्बा देवी आने वाले भक्तगण उनके दिव्य रूप कों जानने लगे , उनके कई शब्द भविष्य की ओर संकेत करते नजर आते थें । जो मंगला माँ कहती लोग ध्यान से सुनते और श्रध्दापूर्वक गृहण करते थें ।
अब श्रध्दावान लोग यहाँ रूकने लगे , माँ अम्बा धाम में सेवा देने लगे । लोभ लालच ईर्ष्या छोड़कर कर माँ अम्बा की सेवा में लोग अपना समय व्यतीत करने लगे । 
माँ अम्बा जिन भक्तों कों बुलाना चाहती वो खुद ही दौड़ा आता था ऐसे ही एक भक्त केशों पटेल का अम्बा देवी की  गुफा में आगमन हुआ , घोघरा कें केशों पटेल पहली बार अम्बा देवी आये थें । मंगला माता कें पास बहूत सारे भक्त लोग बैठे हुए थें ॥ जब भक्तों की भीड़ कम हुई तो केशों पटेल मंगला माता से मिलने पहुंचे , माता ने उनसे पूछा की बोलो बेटा क्या चाहिए तुम्हे , कैसे यहां तुम्हारा आना हुआ । तब केशों पटेल ने बताया की माता मैं यहां दुध की धारा देखने आया था लेकिन किसी ने आपका नाम बताया और मेरे मन में आपके दर्शन की ईच्छा उत्पन्न हुई , मेरी आपसे विनती है , मेरे पास पर्याप्त खेती है एक अच्छा परिवार है , मंगला माता मैं माँ भगवती अम्बे की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता हूँ ।  मंगला माता ने केशों से कहाँ ,  बेटा तुम गांव - गांव में जाकर भक्तों कों यहां आने कें लिए आमंत्रन भेजो तुम्हे अम्बा माता का भी यही आदेश है , इसी से तुम्हारा कल्याण होगा । केशों पटेल तपस्वी मंगला की शक्ति कों जान चूके थें इसलिए वे मंगला माता कें बताए मार्ग पर चलने लगे ।
केशों पटेल कें पास एक घोड़ा था उस घोड़े पर सवार होकर वे जंगल से चलते हुए अम्बा देवी आया करते थें ।
माँ मंगला ने अन्न तो खाना छोड़ दिया था । माँ मंगला सिंगाडे , मूंगफली  कें दाने और चाय का सेवन किया करती थी ।  । केशों का कोई सप्ताह खाली नही जाता था की वे अम्बा माई नही जाते थें ।
एक दिन की बात है केशों गांव जाना चाहते थें , लेकिन
मंगला माता की ईच्छा नही थी इसलिए जब गांव जाने कें लिए केशों तैयार हुए तो उनका घोड़ा गायब हो गया । जंगल में बहूत तलाश किया लेकिन कही नजर नही आया ,  वही मंगला माता केशों कों हैरान परेशान देखकर मंद मंद मुस्कुरा रही थी । बहूत तलाश करने कें बाद भी घोड़ा नही मिला तो मंगला माता से पास जाकर रोने लगे , माँ तु जगदम्बा का रूप ही है , तेरे बिना यहाँ पत्ता भी नही हिल सकता । तु जो चाहती वही होता है अब बताए क्या आदेश है मेरे लिए ।
मंगला माता ने कहाँ की बेटा चिन्ता मत करो आज तुम्हे वो दिव्य गुफा कें दर्शन यात्रा कराने लें कर चल रही हूँ जहाँ कें दर्शन करने कें लिए अम्बा देवी आने वाला हर भक्त तरसते रहेगा लेकिन उसे प्राप्त नही होगे । जब कोई समर्पित भक्त माँ अम्बा की परीक्षाओं में पास होगा तब माँ उसे अवसर देगी ।  माँ अम्बा की प्रेरणा से मंगला माता ने केशों कों ऋषि मुनि आश्रम गुप्त गुफा कें दर्शन कराये जहाँ मंगला देवी कों माँ अम्बा देवी का साक्षात्कार हुआ । तब माँ अम्बा ने तपस्वी से कहाँ की अपने गुरू सूरदास महाराज को यहां लेकर आओ वो आपको आगे मार्ग बताएंगे ।

केशों पटेल मंगला माता कें निर्देश पर उनके गुरू सूरदास महाराज कों अम्बा माई लेकर आये ।
माँ मंगला कें गुरू सूरदास महाराज जब अम्बा देवी पहुंचे तो उन्होने भक्तजनों कें बीच भविष्यवाणी की ।
बहूत जल्द अम्बा देवी धाम का दूर दूर तक प्रचार हो जाएगा , माता अम्बा कें इस धाम बस , ट्रक और गाड़ियां चालू हो जाएगी , यहां नवरात्रि और शिवरात्रि कों लाखो भक्तों का आगमन होगा ।
धीरे धीरे माँ अम्बा देवी का दरबार महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश कें लाखो श्रध्दालुओ की आस्था और श्रध्दा का केन्द्र बन गया ।

मानव पर ही नही अन्य जीवो पर भी माता मंगला का स्नेह प्रेम रहा है । अपने बच्चो कें समान खिलाना , दुध पिलाना प्रेम करना उनकी आदत थी  । बिल्ली पर इनका विशेष प्रेम था । बिल्ली कें लिए प्रतिदिन दुध आता था , उसकी देखभाल करने में कोई कमी नही रहने देती थी । वह बिल्ली मंगला माता कें साथ दिन रात रहती थी ।
माँ अम्बा कें मंदिर आने वाले शेरों कों भी मंगला माता का आदेश था की वे किसी भी भक्त कों कभी नुकसान नही पहुंचाए । मन्दिर में विषधर सांपों कें झुण्ड कें झुण्ड निकलते थें , माता ने सांपों कों भी मन्दिर परिसर से गुप्त रहने का आग्रह किया था ।
माँ दुर्गा की सवारी शेर भी प्रतिदिन माँ अम्बा कें दर्शन कें लिए आता था इसीलिए माँ मंगला ने मन्दिर कें गर्भ गृह में सोने वाले भक्तों कें लिए कड़ा नियम बना रखा था , अगर रात्री कों कोई आप कें शरीर छुए या किसी कें चलने का आभास हो तो शान्त अवस्था में रहने और जागे तो पुनः सो जाये ।
माँ मंगला कें तपोबल की ही शक्ति है जो घने जंगल में लोगों कें सामने सैकड़ो बार शेर आया लेकिन आज तक किसी कों कोई नुकसान नही पहुचाया ।
  एक दिन अम्बा माता ने मंगला देवी कों दर्शन दिये और कहाँ की बेटी तुम्हारे लिए अयोध्या यही है , यही गंगा सागर है , यहाँ हरीद्वार है इसलिए मेरी बात का ध्यान रखो इस धाम कों छोड़कर कभी कही मत जाना ।
  भक्तों द्वारा मंगला माता कों तीर्थ यात्रा पर चलने का अनुरोध किया जा रहा था , जब बार बार भक्तों ने प्रार्थना की तो मंगला माता यात्रा पर चलने कें लिए राजी हो गई ।
कहते है की मंगला माता ने सन 1978 मे 35 भक्तो कें साथ भारत के प्रमुख तीर्थो की दर्शन यात्राए की । जिनमे राम जन्मभूमि अयोध्या, गंगासागर, रामेश्वर, हरिद्वार आदि आदि तीर्थ थें  ।
इस यात्रा में मंगला माँ की सखी राधा बाई नही गई थी ।
यात्रा में मंगला माता कों कष्ट में देख राधा बाई ने घर से देवी अम्बा की उपासना कर उसकी रक्षा की ।
 । कहते है की मंगला मां ने ही इस यात्रा का सम्पूर्ण खर्च उठाया ।  जब मंगला माता यात्रा से लौटकर आयी तो माँ अम्बा  देवी मन्दिर का सम्पूर्ण वातावरण ही बदल चुका था ।  कितने वर्षों कि तपस्या कर अम्बा देवी कें पवित्र स्थान कों जागृत किया था लेकिन आज अम्बा माँ कें मन्दिर कि सभी दैविक शक्तियां कों अधर्मियो ने बंधक कर डाला । मंगला देवी कों माँ अम्बा कि एक बात बार याद आ रही थी बेटी इस मन्दिर कों छोड़कर मत जाना वरना यहां अनर्थ हो जाएगा ।
उस वक्त अम्बा मन्दिर में माँ मंगला कि सेवा कन्हैया महाराज करते थें । वही मंगला माता कें कपड़े धोते थें । वही माता कों पानी पिलाते , वही अम्बा देवी दरबार की साफ सफाई करते थें ।
 कहते है की सन 1984 गुरू पूर्णिमा की रात्री थी मन्दिर में कन्हैया महाराज और माँ मंगला थी , तेज बारिश हो रही थी ।
उसी अर्धरात्री मंगला माता का स्वर्गवास हो गया ।  कन्हैया महाराज माँ कें चरणो में गिर गए और फुट फुट कर रोने लगे । मन्दिर में कोई नही था तेज पानी आ रहा था ।कन्हैया महाराज उसी दौरान तेज पानी से चलकर अम्बा भक्तों कों सूचना देने कें लिए निकल पड़े । कन्हैया महाराज ने घोघरा में अपने पिता कों मंगला माँ कें स्वर्गवास की सूचना दी , इसके अलावा आठनेर कें सुभाजी घोड़की कों सूचना दी , हिडली कें अम्बा भक्तों कों जाकर अवस्था कें बारे में बताया । सभी भक्तगण अम्बा देवी आये । जब सभी भक्तगण आ गए तो मंगला देवी कों समाधि दी गई ।
मंगला माता का सतीत्व इतना पावन और पवित्र था
मंगला माता अम्बा माई धाम में बैठे भक्तों कों बता देती थी की आज कौनसे गांव कें भक्तों का जत्था आ रहा है । मंगला माता आदिवासी महिला का रूप लेकर सैकड़ो भक्तों कों बरसात में नदी पार कराने जाती थी । कहते है की मंगला माता प्रातः उठते ही स्नान कर माता अम्बा की पुजा की तैयारी करती , माता का पवित्र जल से स्नान कर वस्त्र अलंकार , पुष्प अर्पित करती । मंगला देवी की एक लीला जिसे कोई नही समझ पाया , कोई भी उनके जीते जी उनकी तस्वीर अपने घर पर नही रख सका ।
कई भक्तों ने कैमरे या मोबाईल में मंगला माता की तस्वीर निकाली लेकिन जब देखते तो वह अपने आप ही गायब हो जाती थी । कभी कभी  मंगला माता , अम्बा माता और काली बिल्ली तीनों हि अम्बा मन्दिर में रहा करते थें ।
अम्बा देवी मन्दिर में जब छली , कपटी लोग आ कर अपनी तानाशाही बताते तो मंगला माता उन्हे फटकार लगाने में भी पीछे नही रहती थी ।
वर्ष 1984 मे मंगला मां के देह त्यागने के बाद ही मां की तस्वीर निकल पाई।
तपस्वी सन्त मां मंगला के रहते धारूल की अम्बा मांई दरबार में चमत्कार पर चमत्कार होते गए और माँ अम्बा माता पर श्रध्दा आस्था रखने वाले भक्त इसका फायदा उठाते गए ।
तपस्वी सन्त मंगला देवी की सेवा में रात दिन लगे रहने वाले कन्हैया कों महाराज नाम मंगला माता ने ही दिया था इसलिए अम्बा देवी से जुड़े सभी भक्तगण उन्हे कन्हैया महाराज कहते थें । माँ अम्बा देवी मन्दिर की सेवा का आगे का कार्यभार कन्हैया महाराज ने संभाला । केशों पटेल ने माँ मंगला देवी की समाधि स्थान पर माँ मंगला की मूर्ति लाकर स्थापना की ।
तपस्वी सन्त मंगला देवी का सपना था की माँ अम्बा का मन्दिर विश्वभर में प्रख्यात हो लेकिन मन्दिर पर स्वामित्व स्थापित करने कें लिए एक कें पीछे एक समितियॉ गठित होते गई लेकिन किसी ने अम्बा महिमा जन जन पहुचाने का कार्य नही किया ।
वर्ष 2012 तक सोशल मीडिया पर अम्बादेवी मंदिर का प्रचार प्रसार आरम्भ हि नही हो पाया था ।  ना हि अम्बा मन्दिर पर 1984 से 2012 तक स्थापित समितियो द्वारा माँ अम्बा की महिमा संकलित की और ना हि भगवती अम्बा पर भजन गीत या गाथाओं निर्माण हुआ । वैसे अम्बा देवी मन्दिर संस्थान कों लाखो का दान प्राप्त हुआ , इसके अलावा माता पर अर्पित सोने चांदी कें आभूषण , वस्त्र अलंकार की भी गणना करना मुश्किल है । लेकिन समिति ने तपस्वी माँ मंगला माता कें सपनो कों पुरा करने कें लिए कोइ प्रयास नही किया ।
 लेकिन वर्ष 2012 में माँ अम्बा ने एक भक्त कों स्वप्न में दृष्टांत देकर अपने दरबार आने का पहली बार बुलावा भेजा । माँ अम्बा देवी भक्त ने 22 वर्ष की उम्र में अम्बा धाम की पहली यात्रा की और माँ अम्बा की जीवन भर महिमा लिखने और जन जन तक पहुचाने का संकल्प लें लिया ।
माँ अम्बा कें उस भक्त नाम रविन्द्र है और वो उसी गांव का है जहाँ मंगला माता की सखी राधा बाई रहती है ।
राधा बाई आज भी जीवित है रविन्द्र ने राधा बाई , घोघरा कें केशों पटेल , धारूल की मनका माँ , कन्हैया महाराज , आठनेर कें सुनील भोपलें , सुभाजी घोड़की परिवार , हिवरा की राधिका कापसे , मांडवी कें हरी खण्डय आदि अम्बादेवी दरबार धारूल से जुड़े हर छोटे और बढ़े भक्त से माँ अम्बा देवी ,मंगला तपस्वी की महिमा सुनी , महिमा कों लिखित रूप में प्राप्त किया , भक्तजनों कें वीडियो बनाए ।
इसके बाद अम्बा माँ की प्रेरणा से जोगवा अर्थात भिक्षा अर्थात जन सहयोग से धारूल अम्बा देवी महिमा पर माई का डंका बाजे रे भजन एलबम बनाया ।
इस भजन एलबम का निर्माण करने कें दौरान रविन्द्र कों कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा , अपनी नौकरी छोड़ना पड़ा , यहां तक एक रात थाने में गुज़रना पड़ा ।
जब कुछ मन्दिर से जुड़े पापियों ने माँ अम्बा गहने चुरा लिए तो उनका खुलासा भी देवी भक्त ने खुलकर किया ।
धारूल अम्बा देवी मन्दिर , माँ अम्बा देवी , तपस्विनी मंगला की महिमा से जुड़े सैकड़ो वीडियो देवी भक्त ने सोशल मीडिया , युटुब पर डाल रखे है , देवी भक्त की लिखी अम्बा देवी महिमा करोडो लोग देखे चूके है ।
माँ अम्बा का भक्त रविन्द्र स्वयं माँ अम्बा की प्रेरणा से कार्य करता है , उसे मन्दिर से जुड़ी किसी समिति और नेता से लेना देना नही , वो सत्य लिखता है चाहे परिणाम कुछ भी हो ।
माँ अम्बा कें भक्तों की कोई समस्या हो माता का भक्त आगे आकर उन्हे उपाय बताता है । केशों दादा की प्रेरणा से अम्बा दरबार की ऋषि मुनि आश्रम की गुप्त गुफा का मार्ग भी माता कें भक्त ने खोज लिया है ।
तो भक्तों ये अम्बा माता की प्यारी भक्त तपस्वी सन्त मंगला की कहानी है । मंगला माता की लीलाओं का संग्रह बहूत बड़ा है लेकिन इस कहानी में हम एक संक्षिप्त परिचय लेकर आये है ।
माँ अम्बा देवी कें भक्त रविन्द्र का कहना है ..
माँ अम्बा का हर बेटा और बेटी माँ से कुछ भी मांग सकता है । मन हि मन माँ से जिद कर सकता है । आदि शक्ति माँ अम्बा कों , तपस्विनी माँ मंगला कों मना सकता है । इसलिए मंगला माता कें बनाए नियमो पर चलने की आवश्यता है ।

मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य बैतूल जिले की आठनेर तहसील की ग्राम पंचायत धारूल का यह जागृत धार्मिक स्थान आज भी हजारो किस्सो कहानियों से जुड़ा हुआ है। यहां पर सबसे अधिक पड़ौसी सीमावर्ती महाराष्ट्र के अमरावति ,वरूड़ , परतवाड़ा क्षेत्र के ग्रामिण श्रद्धालु भक्त आते रहते है।

संकलनकर्ता - श्री महाकाल भक्त रविन्द्र मानकर 

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

कुनबी समाज कें कुल्देवता का परिचय

छत्रिय लोनारी कुनबी समाज की कुलदेवी माँ उमा देवी है वही हजारो वर्षों से कुल्देवता नाग देवता कें नाम से प्रसिद्ध है । मध्यप्रदेश , महाराष्ट्र ,और गुजरात में कुलदेवी माँ उमा ( उमिया ) देवी कें जगह - जगह बड़े प्यारे सुन्दर मन्दिर है । 
मध्यप्रदेश में माँ उमादेवी कों भक्तगण कुलस्वामिनी श्री रेणुका , अम्बादेवी , एकवीरा कें नामो से भी जानते है । 
कुनबी समाज के कई श्रध्दावान भक्तों कों माँ उमा देवी ने स्वप्न में दर्शन देकर अपने माहात्म्य का जन जन तक प्रचार करने की प्रेरणा दी है । 
कुनबी समाज कें इष्ट देव भगवान शिव है । 
अपने इष्ट भगवान शिव तथा उनके अवतारों को मानने कें कारण कुनबी भी शैव कहलाए ।
कुनबी शब्द की उत्पति कुटुम्बिन शब्द से हुई है । 
कुटुम्बी का अर्थ है किसान परिवार का मुखिया । हिन्दी में कुर्मी , गुजराती में कनबी , मराठी में कुनबी कहाँ जाता है । 
बिस पीढ़ियों पूर्व कुनबी पंजाब में रहा करते थें उस दौरान कुलदेवी माँ उमा देवी की पुजा पध्दति आरम्भ थी । 

इसकें बाद कुनबी गुजरात , मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में निवास करने लगे । गुजरात में रहने वाले कुन्बियो ने कुलदेवी की पुजा उपासना आरम्भ रखी वही मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र कें रहने वाले कुन्बियो ने अपने इष्ट शिव भगवान कें आभूषण नागदेवता की पूजा आरम्भ कर दी ।

 इसी कें परिणाम स्वरूप किसानों ने नागद्वारी , पचमढ़ी , महादेव की यात्रा आरम्भ कर दी । आज कुनबी समाज कें लगभग सभी परिवार कुल रक्षक , कुल्देवता कें रूप में नागदेवता की पुजा कर रहे है । 
परिवार की सुख शांति और मंगल कामना कें लिए नागदेवता से मन्नत , नवस कबूलना प्रथा का अधिक प्रचलन है । 

कुनबी समाज में पहले शिवजी की पुजा करते है  , फिर उनके गले कें आभूषण नागदेवता की पुजा की जाती है । कुनबी समाज में ऐसी मान्यता भी है की शिव की पूजा करके नागों की पूजा करेंगे तो वो कभी अनियंत्रित नहीं होंगे । 

नागदेवता की पूजा कुनबी समाज (कृषक समाज ) ,में कब से शुरू हुई , कहना मुश्किल है । लेकिन इस पुजा आरम्भ होने कें पीछे एक कहानी बहुत प्रचलित है ।... 

किसी समय एक किसान अपने दो पुत्रों और एक पुत्री के साथ रहता था। एक दिन खेतों में हल चलाते समय किसान के हल के नीचे आने से नाग के तीन बच्चे मर गए। नाग के मर जाने पर नागिन ने रोना शुरू कर दिया और उसने अपने बच्चों के हत्यारे से बदला लेने का प्रण किया।

रात में नागिन ने किसान व उसकी पत्नी सहित उसके दोनों लड़कों को डस लिया। अगले दिन प्रात: किसान की पुत्री को डसने के लिये नागिन फिर चली तो किसान की कन्या ने उसके सामने दूध से भरा कटोरा रख दिया। और नागिन से हाथ जोड़कर क्षमा मांगने लगी। नागिन ने प्रसन्न होकर उसके माता-पिता व दोनों भाइयों को पुन: जीवित कर दिया।
यह बात दूर दूर तक फैली तो कृषक परिवारों ने शिवजी कें गले कें आभूषण नागदेवता महाराज की पुजा भी आरम्भ कर दी । 
यही वजह है कि हजारों साल से देश के कुनबी किसान सांपों को नाग देवता मानकर उनकी पूजा करते आ रहे हैं।
पुराणो में वर्णन मिलता है की नागों की पूजा करके आध्यात्मिक और अपार धन की प्राप्त‍ि की जा सकती है और ऋषि-मुनियो ने नागोपासना में अनेक व्रत-पूजनका विधान किया है ।

 इसी बात कों ध्यान में रखते हुए कुनबी कृषक समाज कें लोगों ने अपने इष्टदेव भगवान शिव जी की पुजा आराधना करके कें बाद उनके आभूषण नागदेवता की कुल रक्षक कें रूप में पूजा आरम्भ कर दी । 

 कुन्बियो का यह विश्वास है की उनके कुल्देवता नागदेव भगवान भूगर्भ में निवास कर पृथ्वी की रक्षा करते हैं। वहीं फसल को बचाने में भी इनकी भूमिका होती है। यही नही नागदेवता फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों कों खाकर कृषक कुन्बियो का भला करते हैं।

 नाग देवता को भूजल का श्रोत भी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि भूजल की रक्षा नागदेवता ही करते हैं इसलिए इनकी पूजा कुल्देवता कें रूप में की जाती है। नाग को भगवान शिव का एक अंग माना जाता है जो इसकी पूजा का एक और कारण है।
कहते है की सांप खेतों में रहकर कृषि-संपदा (अनाज) को नुकसान पहुंचाने वाले चूहों को खा जाते हैं, इसलिए उन्हें किसानों का रक्षक अथवा क्षेत्रपाल भी कहा जाता है। अनेक जीवन-रक्षक औषधियों के निर्माण हेतु नागों से प्राप्त जहर की जरूरत होती है। अत: नाग हमारा जीवन-रक्षक भी है। इसी कारण आधुनिकता के वर्तमान युग में भी नाग कों कुल्देवता या कुल रक्षक कें रूप में पूजा जाता है । 

पर्यावरण - संतुलन में मदद करने वाला सांप देवाधिदेव शिवजी के कंठ का हार बनता है, तभी कों सारा कृषक परिवार कुल की प्रमुख में नागदेवता कों विशेष स्थान देता है । हिंदू धर्मग्रंथों में नाग को प्रत्येक पंचमी तिथि का देवता माना गया है, परंतु छत्रिय लोणारी समाज की प्रत्येक कुल की  पुजा में नाग की पूजा को विशेष महत्व दिया गया है।
मानव सभ्यता में नागों कों शक्ति और सूर्य का अवतार बताया गया है । 
नागदेव वन, उपवन, बाग़ बगीचे,फल देने वाले पेड़ , और सुगंधित पुष्प देने वाले पौधे की रक्षा करने वाले देव के रूप में भी माना जाता है
नागपूजा आर्य धर्म में सम्मिलित होने के बाद नागदेव को द्रव्य यानी धन का रक्षक देव और ग्राम अधिपति देव माना गया है । 
गुजरात , मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र कें कुनबी कृषकों कें  हर गांव  में नागदेवता के मंदिर है । 
कुन्बियो की अपने कुलदेवता पर अटूट श्रध्दा और भक्ति है , अपने समाज का कोई भी सामाजिक या मंगल कार्य हो अपने कुल्देवता का आशीर्वाद लेकर हि पुनीत कार्य का शुभारंभ करते है । यही कारण है की कुनबी कुटुंब में नागदेवता  को पुत्र या पुत्री का फल देने वाला, शिशु या बालक की रक्षा करने वाला देव माना गया है । 

कुल्देवता नागदेवता की पुजा में लगने वाली आवश्यक सामग्री और पद्धति ...
नागदेवता को हल्दी, रोली, चावल और फूल , बेलपत्र अर्पित करने कें, बाद चने, खील बताशे और जरा सा कच्चा दूध प्रतिकात्मक रूप से अर्पित करेंगे । 
इसके अलावा सावा , महुआ , हलवा प्रसादी , निवेद, नारियल , नीम्बू आटे कें नाग , से भी कुल रक्षक की पुजा की जाती है ।